विधि:
3. उसके पश्चात, नीचे दिए गए विस्तृत पूजा विधान का पालन करें।
पुनः सङ्कल्पम् –
(पुष्पाक्षत लेकर दाहिने हाथ में एक बूंद जल लें और नीचे दिए गए संकल्प का पाठ करें)
पूर्वोक्त एवं गुणविशेषण विशिष्टायां शुभतिथौ श्री परमेश्वर मुद्दिश्य श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थं श्री रुद्र नमक प्रथम अनुवाक विधानेन यावच्छक्ति ध्यानावाहनादि षोडशोपचार पूजां करिष्ये ॥
(इस प्रकार पढ़कर पुष्प और अक्षत को पात्र में रख दें और हाथ धो लें)
ध्यानम् –
आपाताल-नभःस्थलांत-भुवन-ब्रह्मांड-माविस्फुरत्-
ज्योतिः स्फाटिक-लिंग-मौलि-विलसत्-पूर्णेंदु-वांतामृतैः ।
अस्तोकाप्लुत-मेक-मीश-मनिशं रुद्रानु-वाकांजपन्
ध्याये-दीप्सित-सिद्धये ध्रुवपदं-विँप्रोऽभिषिंचे-च्चिवम् ॥
ब्रह्मांड व्याप्तदेहा भसित हिमरुचा भासमाना भुजंगैः
कंठे कालाः कपर्दाः कलित-शशिकला-श्चंड कोदंड हस्ताः ।
त्र्यक्षा रुद्राक्षमालाः प्रकटितविभवाः शांभवा मूर्तिभेदाः
रुद्राः श्रीरुद्रसूक्त-प्रकटितविभवा नः प्रयच्चंतु सौख्यम् ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः ध्यायामि ।
(थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
आवाहनम् –
ओं नमो भगवते॑ रुद्रा॒य ॥
नम॑स्ते रुद्र म॒न्यव॑ उ॒तोत॒ इष॑वे॒ नमः॑ ।
नम॑स्ते अस्तु॒ धन्व॑ने बा॒हुभ्या॑मु॒त ते॒ नमः॑ ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः आवाहयामि ।
(थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
आसनम् –
या त॒ इषुः॑ शि॒वत॑मा शि॒वं ब॒भूव॑ ते॒ धनुः॑ ।
शि॒वा श॑र॒व्या॑ या तव॒ तया॑ नो रुद्र मृडय ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः नवरत्नखचित सुवर्ण सिंहासनं समर्पयामि ।
(स्वामी को सिंहासन अर्पित करने का भाव करते हुए, थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
पाद्यम् –
या ते॑ रुद्र शि॒वा त॒नूरघो॒राऽपा॑पकाशिनी ।
तया॑ नस्त॒नुवा॒ शंत॑मया॒ गिरि॑शंता॒भिचा॑कशीहि ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि ।
(स्वामी के चरण धोने का भाव करते हुए, देवता की पंचपात्र का जल उद्दरणी से स्वामी को दिखाकर दूसरे पात्र में छोड़ दें)
अर्घ्यम् –
यामिषुं॑ गिरिशंत॒ हस्ते॒ बिभ॒र्ष्यस्त॑वे ।
शि॒वां गि॑रित्र॒ तां कु॑रु॒ मा हिग्ं॑सीः॒ पुरु॑षं॒ जग॑त्॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः हस्तयोः अर्घ्यं समर्पयामि ।
(स्वामी के हाथ धोने का भाव करते हुए, देवता की पंचपात्र का जल उद्दरणी से स्वामी को दिखाकर दूसरे पात्र में छोड़ दें)
आचमनीयम् –
शि॒वेन॒ वच॑सा त्वा॒ गिरि॒शाच्छा॑ वदामसि ।
यथा॑ नः॒ सर्व॒मिज्जग॑दय॒क्ष्मग्ं सु॒मना॒ अस॑त् ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः मुखे आचमनीयं समर्पयामि ।
(देवता की पंचपात्र का जल उद्दरणी से स्वामी को दिखाकर दूसरे पात्र में छोड़ दें और स्वामी के मुख धोकर जल पीने का भाव करें)
पञ्चामृत स्नानम् –
आप्या॑यस्व॒ समे॑तु ते वि॒श्वत॑स्सोम॒ वृष्णि॑यम् ।
भवा॒ वाज॑स्य सङ्ग॒थे ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः क्षीरेण स्नपयामि ।
(गाय के दूध से अभिषेक कर के तेल या घी के दीप से आरती दें)
(जल से अभिषेक कर के प्रतिमा को शुद्ध करें)
द॒धि॒क्राव्णो॑ अकारिषं जि॒ष्णोरश्व॑स्य वा॒जिन॑: ।
सु॒र॒भि नो॒ मुखा॑ कर॒त्प्राण॒ आयूग्ं॑षि तारिषत् ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः दध्ना स्नपयामि ।
(गाय के दही से अभिषेक कर के तेल या घी के दीप से आरती दें)
(जल से अभिषेक कर के प्रतिमा को शुद्ध करें)
शु॒क्रम॑सि॒ ज्योति॑रसि॒ तेजो॑सि दे॒वोव॑स्सवि॒तोत्पु॑ना॒तु
अच्छि॑द्रेण प॒वित्रे॑ण॒ वसो॒स्सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॑: ।
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः आज्येन स्नपयामि ।
(गाय के घी से अभिषेक कर के तेल या घी के दीप से आरती दें)
(जल से अभिषेक कर के प्रतिमा को शुद्ध करें)
मधु॒वाता॑ ऋताय॒ते मधु॑क्षरन्ति॒ सिन्ध॑वः ।
माध्वी᳚र्नः स॒न्त्वौष॑धीः ।
मधु॒नक्त॑मु॒तोष॑सि॒ मधु॑म॒त् पार्थि॑व॒ग्ं॒रज॑: ।
मधु॒द्यौर॑स्तु नः पि॒ता ।
मधु॑मान्नो॒ वन॒स्पति॒र्मधु॑माग्ं अस्तु॒ सूर्य॑: ।
माध्वी॒र्गावो॑ भवन्तु नः ।
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः मधुना स्नपयामि ।
(शहद से अभिषेक कर के तेल या घी के दीप से आरती दें)
(जल से अभिषेक कर के प्रतिमा को शुद्ध करें)
स्वा॒दुः प॑वस्व दि॒व्याय॒ जन्म॑ने ।
स्वा॒दुरिन्द्रा᳚य सु॒हवी᳚तु नाम्ने ।
स्वा॒दुर्मि॒त्राय॒ वरु॑णाय वा॒यवे॒ ।
बृह॒स्पत॑ये॒ मधु॑मां॒ अदा᳚भ्यः ।
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः शर्करेण स्नपयामि ।
(चीनी से अभिषेक कर के तेल या घी के दीप से आरती दें)
(जल से अभिषेक कर के प्रतिमा को शुद्ध करें)
याः फ॒लिनी॒र्या अ॑फ॒ला अ॑पु॒ष्पायाश्च॑ पु॒ष्पिणी॑: ।
बृह॒स्पति॑ प्रसूता॒स्तानो॑ मुन्च॒न्त्वग्ं ह॑सः ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः फलोदकेन स्नपयामि ।
(फलों के रस से अभिषेक कर के तेल या घी के दीप से आरती दें)
(जल से अभिषेक कर के प्रतिमा को शुद्ध करें)
स्नानम् –
अध्य॑वोचदधिव॒क्ता प्र॑थ॒मो दैव्यो॑ भि॒षक् ।
अहीग्॑श्च॒ सर्वां᳚जं॒भय॒न्-थ्सर्वा᳚श्च यातुधा॒न्यः॑ ॥
आपो॒ हिष्ठा म॑यो॒भुव॒स्ता न॑ ऊ॒र्जे द॑धातन ।
म॒हेरणा॑य॒ चक्ष॑से ।
यो व॑: शि॒वत॑मो रस॒स्तस्य॑ भाजयते॒ ह न॑: ।
उ॒श॒तीरि॑व मा॒त॑रः ।
तस्मा॒ अर॑ङ्गमामवो॒ यस्य॒ क्षया॑य॒ जिन्व॑थ ।
आपो॑ ज॒नय॑था च नः ।
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि ।
(पुष्प से स्वामी पर देवता की पंचपात्र का थोड़ा जल छिड़क कर, उस पुष्प को स्वामी के चरणों में रख दें और स्वामी को स्नान कराने का भाव करें)
स्नानानन्तरं शुद्ध आचमनीयं समर्पयामि ।
(देवता की पंचपात्र का जल उद्दरणी से स्वामी को दिखाकर दूसरे पात्र में छोड़ दें और स्वामी के मुख धोकर जल पीने का भाव करें)
वस्त्रम् –
अ॒सौ यस्ता॒म्रो अ॑रु॒ण उ॒त ब॒भ्रुस्सु॑मं॒गलः॑ ।
ये चे॒माग्ं रु॒द्रा अ॒भितो॑ दि॒क्षु श्रि॒ताः स॑हस्र॒शोऽवै॑षा॒ग्ं॒ हेड॑ ईमहे ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः वस्त्रयुग्मं समर्पयामि ।
(स्वामी को वस्त्र अर्पित करने का भाव करते हुए, थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
यज्ञोपवीतम् –
अ॒सौ यो॑ऽव॒सर्प॑ति॒ नील॑ग्रीवो॒ विलो॑हितः ।
उ॒तैनं॑ गो॒पा अ॑दृश॒न्नदृ॑शन्नुदहा॒र्यः॑ ।
उ॒तैनं॒-विँश्वा॑ भू॒तानि॒ स दृ॒ष्टो मृ॑डयाति नः ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।
(स्वामी को यज्ञोपवीत अर्पित करने का भाव करते हुए, थोड़े अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
गन्धम् –
नमो॑ अस्तु॒ नील॑ग्रीवाय सहस्रा॒क्षाय॑ मी॒ढुषे᳚ ।
अथो॒ ये अ॑स्य॒ सत्वा॑नो॒ऽहं तेभ्यो॑ऽकर॒न्नमः॑ ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः दिव्य श्री चन्दनं समर्पयामि ।
(गंध को जल से भिगो कर, एक पुष्प से स्वामी पर छिड़क कर, उस पुष्प को स्वामी के चरणों में रख दें)
आभरणम् –
प्रमुं॑च॒ धन्व॑न॒स्त्वमु॒भयो॒रार्त्नि॑ यो॒र्ज्याम् ।
याश्च॑ ते॒ हस्त॒ इष॑वः॒ परा॒ ता भ॑गवो वप ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः सर्वाभरणानि समर्पयामि ।
(स्वामी को आभूषण अर्पित करने का भाव करते हुए, थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी को अर्पित करें)
पुष्पाणि –
अ॒व॒तत्य॒ धनु॒स्त्वग्ं सह॑स्राक्ष॒ शते॑षुधे ।
नि॒शीर्य॑ श॒ल्यानां॒ मुखा॑ शि॒वो नः॑ सु॒मना॑ भव ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः नानाविध परिमल पत्र पुष्पाणि समर्पयामि ।
(थोड़े पुष्प स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
धूपम् –
विज्यं॒ धनुः॑ कप॒र्दिनो॒ विश॑ल्यो॒ बाण॑वाग्ं उ॒त ।
अने॑शन्न॒स्येष॑व आ॒भुर॑स्य निषं॒गथिः॑ ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः धूपं समर्पयामि ।
(घंटानाद करते हुए स्वामी को जलाई हुई अगरबत्ती दिखाएं)
दीपम् –
या ते॑ हे॒तिर्मी॑डुष्टम॒ हस्ते॑ ब॒भूव॑ ते॒ धनुः॑ ।
तया॒ऽस्मान्, वि॒श्वत॒स्त्वम॑य॒क्ष्मया॒ परि॑ब्भुज ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः दीपं समर्पयामि ।
(घंटानाद करते हुए स्वामी को जलाया हुआ दीपक दिखाएं)
धूप दीपानंतरं आचमनीयं समर्पयामि ।
(देवता की पंचपात्र का जल उद्दरणी से स्वामी को दिखाकर दूसरे पात्र में छोड़ दें और स्वामी के मुख धोकर जल पीने का भाव करें)
नैवेद्यम् –
नम॑स्ते अ॒स्त्वायु॑धा॒याना॑तताय धृ॒ष्णवे᳚ ।
उ॒भाभ्या॑मु॒त ते॒ नमो॑ बा॒हुभ्यां॒ तव॒ धन्व॑ने ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः नैवेद्यं समर्पयामि ।
(घंटानाद करते हुए, नीचे का मंत्र बोलते हुए पुष्प से जल को नैवेद्य के चारों ओर 3 बार दक्षिणावर्त दिशा में छिड़कें)
ओं भूर्भुव॑स्सुव॑: । तत्स॑वितु॒र्वरे᳚ण्य॒म् । भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धी॒महि ।
धियो॒ योन॑: प्रचो॒दया᳚त् ॥
सत्यं त्वा ऋतेन परिषिञ्चामि (पुष्प से नैवेद्य पर जल छिड़कें)
(सायङ्काले) – ऋतं त्वा सत्येन परिषिञ्चामि (पुष्प से नैवेद्य पर जल छिड़कें)
अमृतमस्तु । अमृतोपस्तरणमसि । (उस पुष्प को स्वामी के चरणों में रख दें)
ओं प्राणाय स्वाहा । (स्वामी को नैवेद्य दिखाएं)
ओं अपानाय स्वाहा । (स्वामी को नैवेद्य दिखाएं)
ओं व्यानाय स्वाहा । (स्वामी को नैवेद्य दिखाएं)
ओं उदानाय स्वाहा । (स्वामी को नैवेद्य दिखाएं)
ओं समानाय स्वाहा । (स्वामी को नैवेद्य दिखाएं)
(नीचे के मंत्र बोलते हुए पुष्प से जल को देवता के ऊपर 5 बार छिड़कें)
मध्ये मध्ये पानीयं समर्पयामि ।
अ॒मृ॒ता॒पि॒धा॒नम॑सि ।
उत्तरापोशनं समर्पयामि ।
हस्तौ प्रक्षालयामि ।
पादौ प्रक्षालयामि ।
शुद्धाचमनीयं समर्पयामि ।
ताम्बूलम् –
परि॑ ते॒ धन्व॑नो हे॒तिर॒स्मान् वृ॑णक्तु वि॒श्वतः॑ ।
अथो॒ य इ॑षु॒धिस्तवा॒रे अ॒स्मन्निधे॑हि॒ तम् ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः ताम्बूलं समर्पयामि ।
(स्वामी को ताम्बूल अर्पित करने का भाव करते हुए, थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
नीराजनम् –
श्री शंभ॑वे॒ नमः॑ ॥
नम॑स्ते अस्तु भगवन्-विश्वेश्व॒राय॑ महादे॒वाय॑ त्र्यंब॒काय॑ त्रिपुरांत॒काय॑ त्रिकाग्निका॒लाय॑ कालाग्निरु॒द्राय॑ नीलकं॒ठाय॑ मृत्युंज॒याय॑ सर्वेश्व॒राय॑ सदाशि॒वाय॑ [शंक॒राय॑] श्रीमन्-महादे॒वाय॒ नमः॑ ।
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः कर्पूर नीराजनं समर्पयामि ।
(घंटानाद करते हुए स्वामी को कपूर की आरती दें)
नीराजनानन्तरं शुद्धाचमनीयं समर्पयामि । नमस्करोमि ।
(देवता की पंचपात्र का जल उद्दरणी से स्वामी को दिखाकर दूसरे पात्र में छोड़ दें और स्वामी के मुख धोकर जल पीने का भाव करें)
मन्त्रपुष्पम् –
ओं तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ।
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः सुवर्ण दिव्य मन्त्रपुष्पं समर्पयामि ।
(थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
आत्मप्रदक्षिण –
यानिकानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च
तानि तानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे ।
पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसम्भव ।
त्राहि मां कृपया देव शरणागतवत्सला ।
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।
तस्मात्कारुण्य भावेन रक्ष रक्ष जनार्दना ।
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः आत्मप्रदक्षिण नमस्कारान् समर्पयामि ।
(अक्षत और पुष्प लेकर, आत्म प्रदक्षिणा तीन बार करें और फिर उन्हें स्वामी के चरणों में रख दें)
साष्टाङ्ग नमस्कारम् –
उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा ।
पद्भ्यां कराभ्यां कर्णाभ्यां प्रणामोष्टाङ्गमुच्यते ॥
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः साष्टाङ्ग नमस्कारान् समर्पयामि ।
(पुरुष साष्टाङ्गं, महिला पञ्चाङ्गं नमस्कारं कुर्युः)
सर्वोपचाराः –
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः छत्रं आच्छादयामि ।
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः चामरैर्वीजयामि ।
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः नृत्यं दर्शयामि ।
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः गीतं श्रावयामि ।
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः आन्दोलिकान्नारोहयामि ।
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः अश्वानारोहयामि ।
ओं श्री परमेश्वराभ्याम् नमः गजानारोहयामि ।
समस्त राजोपचारान् देवोपचारान् समर्पयामि ।
क्षमाप्रार्थना –
अपराध सहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया ।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर ।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
पूजाविधिं न जानामि क्षमस्व परमेश्वर ।
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन ।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु ते ।
(पुष्पाक्षत, एक बूंद जल दाहिने हाथ में लेकर ऊपर का श्लोक पढ़कर, स्वामी के चरणों में रख दें)
अनया ध्यान आवाहनादि षोडशोपचार पूजया भगवान् सर्वात्मकः श्री परमेश्वर सुप्रीता सुप्रसन्ना वरदा भवन्तु ॥
(थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
तीर्थप्रसाद स्वीकरण –
अकालमृत्यहरणं सर्वव्याधिनिवारणम् ॥
समस्तपापक्षयकरं श्री परमेश्वर पादोदकं पावनं शुभम् ॥
श्री परमेश्वराभ्याम् नमः प्रसादं शीरसा गृह्णामि ।
(दाहिने हाथ में जल लेकर, ऊपर का श्लोक पढ़कर तीन बार तीर्थ पीएं)
ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।