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पुरुष सूक्त सहित श्री सूक्त पूजा
विधि:
1.
सबसे
पहले
पूर्वाङ्गम्
करें
।
2.
इसके
बाद,
विघ्नेश्वर पूजा
करें
।
3.
उसके
पश्चात,
नीचे
दिए
गए
विस्तृत
पूजा
विधान
का
पालन
करें
।
पुनः
सङ्कल्पम्
–
(पुष्पाक्षत
लेकर
दाहिने
हाथ
में
एक
बूंद
जल
लें
और
नीचे
दिए
गए
संकल्प
का
पाठ
करें)
पूर्वोक्त
एवं
गुणविशेषण
विशिष्टायां
शुभतिथौ
श्री______मुद्दिश्य
श्री______प्रीत्यर्थं
पुरुषसूक्त
सहित
श्रीसूक्त
यावच्छक्ति
ध्यानावाहनादि
षोडशोपचार
पूजां
करिष्ये
॥
(इस
प्रकार
पढ़कर
पुष्प
और
अक्षत
को
पात्र
में
रख
दें
और
हाथ
धो
लें)
ध्यानम्
–
(जिन
देवी
और
देवता
की
पूजा
करनी
है,
उनके
ध्यान
श्लोकों
का
पाठ
करें)
ओं
श्री
______
नमः
ध्यायामि
।
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
आवाहनम्
–
[पु]
ओं
स॒हस्र॑शीर्षा॒
पुरु॑षः
।
स॒ह॒स्रा॒क्षः
स॒हस्र॑पात्
।
स
भूमिं॑
वि॒श्वतो॑
वृ॒त्वा
।
अत्य॑तिष्ठद्दशाङ्गु॒लम्
।
[श्री]
ओं
हिर॑ण्यवर्णां॒
हरि॑णीं
सु॒वर्ण॑रज॒तस्र॑जाम्
।
च॒न्द्रां
हि॒रण्म॑यीं
ल॒क्ष्मीं
जात॑वेदो
म॒
आव॑ह
॥
ओं
श्री
______
नमः
आवाहयामि
।
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
आसनम्
–
[पु]
पुरु॑ष
ए॒वेदग्ं
सर्वम्᳚
।
यद्भू॒तं
यच्च॒
भव्यम्᳚
।
उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नः
।
य॒दन्ने॑नाति॒रोह॑ति
।
[श्री]
तां
म॒
आव॑ह॒
जात॑वेदो
ल॒क्ष्मीमन॑पगा॒मिनी᳚म्
।
यस्यां॒
हिर॑ण्यं
वि॒न्देयं॒
गामश्वं॒
पुरु॑षान॒हम्
॥
ओं
श्री
______
नमः
नवरत्नखचित
सुवर्ण
सिंहासनं
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
सिंहासन
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
पाद्यम्
–
[पु]
ए॒तावा॑नस्य
महि॒मा
।
अतो॒
ज्यायाग्॑श्च॒
पूरु॑षः
।
पादो᳚ऽस्य॒
विश्वा॑
भू॒तानि॑
।
त्रि॒पाद॑स्या॒मृतं॑
दि॒वि
।
[श्री]
अ॒श्व॒पू॒र्वां
र॑थम॒ध्यां
ह॒स्तिना॑दप्र॒बोधि॑नीम्
।
श्रियं॑
दे॒वीमुप॑ह्वये॒
श्रीर्मा॑दे॒वीर्जु॑षताम्
॥
ओं
श्री
______
नमः
पादयोः
पाद्यं
समर्पयामि
।
(स्वामी
के
चरण
धोने
का
भाव
करते
हुए,
देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें)
अर्घ्यम्
–
[पु]
त्रि॒पादू॒र्ध्व
उदै॒त्पुरु॑षः
।
पादो᳚ऽस्ये॒हाऽऽभ॑वा॒त्पुन॑:
।
ततो॒
विष्व॒ङ्व्य॑क्रामत्
।
सा॒श॒ना॒न॒श॒ने
अ॒भि
।
[श्री]
कां॒
सो᳚स्मि॒तां
हिर॑ण्यप्रा॒कारा॑मा॒र्द्रां
ज्वल॑न्तीं
तृ॒प्तां
त॒र्पय॑न्तीम्
।
प॒द्मे॒
स्थि॒तां
प॒द्मव॑र्णां॒
तामि॒होप॑ह्वये॒
श्रियम्
॥
ओं
श्री
______
नमः
हस्तयोः
अर्घ्यं
समर्पयामि
।
(स्वामी
के
हाथ
धोने
का
भाव
करते
हुए,
देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें)
आचमनीयम्
–
[पु]
तस्मा᳚द्वि॒राड॑जायत
।
वि॒राजो॒
अधि॒
पूरु॑षः
।
स
जा॒तो
अत्य॑रिच्यत
।
प॒श्चाद्भूमि॒मथो॑
पु॒रः
।
[श्री]
च॒न्द्रां
प्र॑भा॒सां
य॒शसा॒
ज्वल॑न्तीं॒
श्रियं॑
लो॒के
दे॒वजु॑ष्टामुदा॒राम्
।
तां
प॒द्मिनी॑मीं॒
शर॑णम॒हं
प्रप॑द्येऽल॒क्ष्मीर्मे॑
नश्यतां॒
त्वां
वृ॑णे
॥
ओं
श्री
______
नमः
मुखे
आचमनीयं
समर्पयामि
।
(देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें
और
स्वामी
के
मुख
धोकर
जल
पीने
का
भाव
करें)
पञ्चामृत
स्नानम्
–
आप्या॑यस्व॒
समे॑तु
ते
वि॒श्वत॑स्सोम॒
वृष्णि॑यम्
।
भवा॒
वाज॑स्य
सङ्ग॒थे
॥
ओं
श्री
______
नमः
क्षीरेण
स्नपयामि
।
(गाय
के
दूध
से
अभिषेक
कर
के
तेल
या
घी
के
दीप
से
आरती
दें)
(जल
से
अभिषेक
कर
के
प्रतिमा
को
शुद्ध
करें)
द॒धि॒क्राव्णो॑
अकारिषं
जि॒ष्णोरश्व॑स्य
वा॒जिन॑:
।
सु॒र॒भि
नो॒
मुखा॑
कर॒त्प्राण॒
आयूग्ं॑षि
तारिषत्
॥
ओं
श्री
______
नमः
दध्ना
स्नपयामि
।
(गाय
के
दही
से
अभिषेक
कर
के
तेल
या
घी
के
दीप
से
आरती
दें)
(जल
से
अभिषेक
कर
के
प्रतिमा
को
शुद्ध
करें)
शु॒क्रम॑सि॒
ज्योति॑रसि॒
तेजो॑सि
दे॒वोव॑स्सवि॒तोत्पु॑ना॒तु
अच्छि॑द्रेण
प॒वित्रे॑ण॒
वसो॒स्सूर्य॑स्य
र॒श्मिभि॑:
।
ओं
श्री
______
नमः
आज्येन
स्नपयामि
।
(गाय
के
घी
से
अभिषेक
कर
के
तेल
या
घी
के
दीप
से
आरती
दें)
(जल
से
अभिषेक
कर
के
प्रतिमा
को
शुद्ध
करें)
मधु॒वाता॑
ऋताय॒ते
मधु॑क्षरन्ति॒
सिन्ध॑वः
।
माध्वी᳚र्नः
स॒न्त्वौष॑धीः
।
मधु॒नक्त॑मु॒तोष॑सि॒
मधु॑म॒त्
पार्थि॑व॒ग्ं॒रज॑:
।
मधु॒द्यौर॑स्तु
नः
पि॒ता
।
मधु॑मान्नो॒
वन॒स्पति॒र्मधु॑माग्ं
अस्तु॒
सूर्य॑:
।
माध्वी॒र्गावो॑
भवन्तु
नः
।
ओं
श्री
______
नमः
मधुना
स्नपयामि
।
(शहद
से
अभिषेक
कर
के
तेल
या
घी
के
दीप
से
आरती
दें)
(जल
से
अभिषेक
कर
के
प्रतिमा
को
शुद्ध
करें)
स्वा॒दुः
प॑वस्व
दि॒व्याय॒
जन्म॑ने
।
स्वा॒दुरिन्द्रा᳚य
सु॒हवी᳚तु
नाम्ने
।
स्वा॒दुर्मि॒त्राय॒
वरु॑णाय
वा॒यवे॒
।
बृह॒स्पत॑ये॒
मधु॑मां॒
अदा᳚भ्यः
।
ओं
श्री
______
नमः
शर्करेण
स्नपयामि
।
(चीनी
से
अभिषेक
कर
के
तेल
या
घी
के
दीप
से
आरती
दें)
(जल
से
अभिषेक
कर
के
प्रतिमा
को
शुद्ध
करें)
याः
फ॒लिनी॒र्या
अ॑फ॒ला
अ॑पु॒ष्पायाश्च॑
पु॒ष्पिणी॑:
।
बृह॒स्पति॑
प्रसूता॒स्तानो॑
मुन्च॒न्त्वग्ं
ह॑सः
॥
ओं
श्री
______
नमः
फलोदकेन
स्नपयामि
।
(फलों
के
रस
से
अभिषेक
कर
के
तेल
या
घी
के
दीप
से
आरती
दें)
(जल
से
अभिषेक
कर
के
प्रतिमा
को
शुद्ध
करें)
स्नानम्
–
[पु]
यत्पुरु॑षेण
ह॒विषा᳚
।
दे॒वा
य॒ज्ञमत॑न्वत
।
व॒स॒न्तो
अ॑स्यासी॒दाज्यम्᳚
।
ग्री॒ष्म
इ॒ध्मश्श॒रद्ध॒विः
।
[श्री]
आ॒दि॒त्यव॑र्णे॒
तप॒सोऽधि॑जा॒तो
वन॒स्पति॒स्तव॑
वृ॒क्षोऽथ
बि॒ल्वः
।
तस्य॒
फला॑नि॒
तप॒सा
नु॑दन्तु
मा॒यान्त॑रा॒याश्च॑
बा॒ह्या
अ॑ल॒क्ष्मीः
॥
आपो॒
हिष्ठा
म॑यो॒भुव॒स्ता
न॑
ऊ॒र्जे
द॑धातन
।
म॒हेरणा॑य॒
चक्ष॑से
।
यो
व॑:
शि॒वत॑मो
रस॒स्तस्य॑
भाजयते॒
ह
न॑:
।
उ॒श॒तीरि॑व
मा॒त॑रः
।
तस्मा॒
अर॑ङ्गमामवो॒
यस्य॒
क्षया॑य॒
जिन्व॑थ
।
आपो॑
ज॒नय॑था
च
नः
।
ओं
श्री
______
नमः
शुद्धोदक
स्नानं
समर्पयामि
।
(पुष्प
से
स्वामी
पर
देवता
की
पंचपात्र
का
थोड़ा
जल
छिड़क
कर,
उस
पुष्प
को
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें
और
स्वामी
को
स्नान
कराने
का
भाव
करें)
स्नानानन्तरं
शुद्ध
आचमनीयं
समर्पयामि
।
(देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें
और
स्वामी
के
मुख
धोकर
जल
पीने
का
भाव
करें)
वस्त्रम्
–
[पु]
स॒प्तास्या॑सन्परि॒धय॑:
।
त्रिः
स॒प्त
स॒मिध॑:
कृ॒ताः
।
दे॒वा
यद्य॒ज्ञं
त॑न्वा॒नाः
।
अब॑ध्न॒न्पुरु॑षं
प॒शुम्
।
[श्री]
उपै॑तु॒
मां
दे॑वस॒खः
की॒र्तिश्च॒
मणि॑ना
स॒ह
।
प्रा॒दु॒र्भू॒तोऽस्मि॑
राष्ट्रे॒ऽस्मिन्
की॒र्तिमृ॑द्धिं
द॒दातु॑
मे
॥
ओं
श्री
______
नमः
वस्त्रयुग्मं
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
वस्त्र
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
यज्ञोपवीतम्
–
[पु]
तं
य॒ज्ञं
ब॒र्हिषि॒
प्रौक्षन्॑
।
पुरु॑षं
जा॒तम॑ग्र॒तः
।
तेन॑
दे॒वा
अय॑जन्त
।
सा॒ध्या
ऋष॑यश्च॒
ये
।
[श्री]
क्षुत्पि॑पा॒साम॑लां
ज्ये॒ष्ठाम॑ल॒क्ष्मीं
ना॑शया॒म्यहम्
।
अभू॑ति॒मस॑मृद्धिं॒
च
सर्वां॒
निर्णु॑द
मे॒
गृहा॑त्
॥
ओं
श्री
______
नमः
यज्ञोपवीतं
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
यज्ञोपवीत
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
गन्धम्
–
[पु]
तस्मा᳚द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॑:
।
सम्भृ॑तं
पृषदा॒ज्यम्
।
प॒शूग्स्ताग्श्च॑क्रे
वाय॒व्यान्॑
।
आ॒र॒ण्यान्ग्रा॒म्याश्च॒
ये
।
[श्री]
ग॒न्ध॒द्वा॒रां
दु॑राध॒र्षां॒
नि॒त्यपु॑ष्टां
करी॒षिणी᳚म्
।
ई॒श्वरी॑ग्ं
सर्व॑भूता॒नां॒
तामि॒होप॑ह्वये॒
श्रियम्
॥
ओं
श्री
______
नमः
दिव्य
श्री
चन्दनं
समर्पयामि
।
(गंध
को
जल
से
भिगो
कर,
एक
पुष्प
से
स्वामी
पर
छिड़क
कर,
उस
पुष्प
को
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
आभरणम्
–
[पु]
तस्मा᳚द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॑:
।
ऋच॒:
सामा॑नि
जज्ञिरे
।
छन्दाग्ं॑सि
जज्ञिरे॒
तस्मा᳚त्
।
यजु॒स्तस्मा॑दजायत
।
[श्री]
मन॑स॒:
काम॒माकू॑तिं
वा॒चः
स॒त्यम॑शीमहि
।
प॒शू॒नां
रू॒पमन्न॑स्य॒
मयि॒
श्रीः
श्र॑यतां॒
यश॑:
॥
ओं
श्री
______
नमः
सर्वाभरणानि
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
आभूषण
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
को
अर्पित
करें)
पुष्पाणि
–
[पु]
तस्मा॒दश्वा॑
अजायन्त
।
ये
के
चो॑भ॒याद॑तः
।
गावो॑
ह
जज्ञिरे॒
तस्मा᳚त्
।
तस्मा᳚ज्जा॒ता
अ॑जा॒वय॑:
।
[श्री]
क॒र्दमे॑न
प्र॑जाभू॒ता॒
म॒यि॒
सम्भ॑व
क॒र्दम
।
श्रियं॑
वा॒सय॑
मे
कु॒ले
मा॒तरं॑
पद्म॒मालि॑नीम्
॥
ओं
श्री
______
नमः
नानाविध
परिमल
पत्र
पुष्पाणि
समर्पयामि
।
(थोड़े
पुष्प
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
धूपम्
–
[पु]
यत्पुरु॑षं॒
व्य॑दधुः
।
क॒ति॒धा
व्य॑कल्पयन्
।
मुखं॒
किम॑स्य॒
कौ
बा॒हू
।
कावू॒रू
पादा॑वुच्येते
।
[श्री]
आप॑:
सृ॒जन्तु॑
स्नि॒ग्धा॒नि॒
चि॒क्ली॒त
व॑स
मे॒
गृहे
।
नि
च॑
दे॒वीं
मा॒तरं॒
श्रियं॑
वा॒सय॑
मे
कु॒ले
॥
ओं
श्री
______
नमः
धूपं
समर्पयामि
।
(घंटानाद
करते
हुए
स्वामी
को
जलाई
हुई
अगरबत्ती
दिखाएं)
दीपम्
–
[पु]
ब्रा॒ह्म॒णो᳚ऽस्य॒
मुख॑मासीत्
।
बा॒हू
रा॑ज॒न्य॑:
कृ॒तः
।
ऊ॒रू
तद॑स्य॒
यद्वैश्य॑:
।
प॒द्भ्याग्ं
शू॒द्रो
अ॑जायत
।
[श्री]
आ॒र्द्रां
पु॒ष्करि॑णीं
पु॒ष्टिं॒
पि॒ङ्ग॒लां
प॑द्ममा॒लिनीम्
।
च॒न्द्रां
हि॒रण्म॑यीं
ल॒क्ष्मीं
जात॑वेदो
म॒
आव॑ह
॥
ओं
श्री
______
नमः
दीपं
समर्पयामि
।
(घंटानाद
करते
हुए
स्वामी
को
जलाया
हुआ
दीपक
दिखाएं)
धूप
दीपानंतरं
आचमनीयं
समर्पयामि
।
(देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें
और
स्वामी
के
मुख
धोकर
जल
पीने
का
भाव
करें)
नैवेद्यम्
–
[पु]
च॒न्द्रमा॒
मन॑सो
जा॒तः
।
चक्षो॒:
सूर्यो॑
अजायत
।
मुखा॒दिन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॑
।
प्रा॒णाद्वा॒युर॑जायत
।
[श्री]
आ॒र्द्रां
य॒:
करि॑णीं
य॒ष्टिं॒
सु॒व॒र्णां
हे॑ममा॒लिनीम्
।
सू॒र्यां
हि॒रण्म॑यीं
ल॒क्ष्मीं॒
जात॑वेदो
म॒
आवह
॥
ओं
श्री
______
नमः
नैवेद्यं
समर्पयामि
।
(घंटानाद
करते
हुए,
नीचे
का
मंत्र
बोलते
हुए
पुष्प
से
जल
को
नैवेद्य
के
चारों
ओर
3
बार
दक्षिणावर्त
दिशा
में
छिड़कें)
ओं
भूर्भुव॑स्सुव॑:
।
तत्स॑वितु॒र्वरे᳚ण्य॒म्
।
भ॒र्गो॑
दे॒वस्य॑
धी॒महि
।
धियो॒
योन॑:
प्रचो॒दया᳚त्
॥
सत्यं
त्वा
ऋतेन
परिषिञ्चामि
(पुष्प
से
नैवेद्य
पर
जल
छिड़कें)
(सायङ्काले)
–
ऋतं
त्वा
सत्येन
परिषिञ्चामि
(पुष्प
से
नैवेद्य
पर
जल
छिड़कें)
अमृतमस्तु
।
अमृतोपस्तरणमसि
।
(उस
पुष्प
को
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
ओं
प्राणाय
स्वाहा
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
अपानाय
स्वाहा
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
व्यानाय
स्वाहा
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
उदानाय
स्वाहा
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
समानाय
स्वाहा
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
(नीचे
के
मंत्र
बोलते
हुए
पुष्प
से
जल
को
देवता
के
ऊपर
5
बार
छिड़कें)
मध्ये
मध्ये
पानीयं
समर्पयामि
।
अ॒मृ॒ता॒पि॒धा॒नम॑सि
।
उत्तरापोशनं
समर्पयामि
।
हस्तौ
प्रक्षालयामि
।
पादौ
प्रक्षालयामि
।
शुद्धाचमनीयं
समर्पयामि
।
ताम्बूलम्
–
[पु]
नाभ्या॑
आसीद॒न्तरि॑क्षम्
।
शी॒र्ष्णो
द्यौः
सम॑वर्तत
।
प॒द्भ्यां
भूमि॒र्दिश॒:
श्रोत्रा᳚त्
।
तथा॑
लो॒काग्ं
अ॑कल्पयन्
।
[श्री]
तां
म॒
आव॑ह॒
जात॑वेदो
ल॒क्ष्मीमन॑पगा॒मिनी᳚म्
।
यस्यां॒
हि॑रण्यं॒
प्रभू॑तं॒
गावो॑
दा॒स्योऽश्वा᳚न्वि॒न्देयं॒
पुरु॑षान॒हम्
॥
ओं
श्री
______
नमः
ताम्बूलं
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
ताम्बूल
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
नीराजनम्
–
[पु]
वेदा॒हमे॒तं
पुरु॑षं
म॒हान्तम्᳚
।
आ॒दि॒त्यव॑र्णं॒
तम॑स॒स्तु
पा॒रे
।
सर्वा॑णि
रू॒पाणि॑
वि॒चित्य॒
धीर॑:
।
नामा॑नि
कृ॒त्वाऽभि॒वद॒न्॒
यदास्ते᳚
।
[श्री]
यः
शुचि॒:
प्रय॑तो
भू॒त्वा
जु॒हुया᳚दाज्य॒
मन्व॑हम्
।
श्रिय॑:
प॒ञ्चद॑शर्चं॒
च
श्री॒काम॑:
सत॒तं
ज॑पेत्
॥
ओं
श्री
______
नमः
कर्पूर
नीराजनं
समर्पयामि
।
(घंटानाद
करते
हुए
स्वामी
को
कपूर
की
आरती
दें)
नीराजनानन्तरं
शुद्धाचमनीयं
समर्पयामि
।
नमस्करोमि
।
(देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें
और
स्वामी
के
मुख
धोकर
जल
पीने
का
भाव
करें)
मन्त्रपुष्पम्
–
धा॒ता
पु॒रस्ता॒द्यमु॑दाज॒हार॑
।
श॒क्रः
प्रवि॒द्वान्प्र॒दिश॒श्चत॑स्रः
।
तमे॒वं
वि॒द्वान॒मृत॑
इ॒ह
भ॑वति
।
नान्यः
पन्था॒
अय॑नाय
विद्यते
।
ओं
श्री
______
नमः
सुवर्ण
दिव्य
मन्त्रपुष्पं
समर्पयामि
।
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
आत्मप्रदक्षिण
–
यानिकानि
च
पापानि
जन्मान्तरकृतानि
च
तानि
तानि
प्रणश्यन्ति
प्रदक्षिण
पदे
पदे
।
पापोऽहं
पापकर्माऽहं
पापात्मा
पापसम्भव
।
त्राहि
मां
कृपया
देव
शरणागतवत्सला
।
अन्यथा
शरणं
नास्ति
त्वमेव
शरणं
मम
।
तस्मात्कारुण्य
भावेन
रक्ष
रक्ष
जनार्दना
।
ओं
श्री
______
नमः
आत्मप्रदक्षिण
नमस्कारान्
समर्पयामि
।
(अक्षत
और
पुष्प
लेकर,
आत्म
प्रदक्षिणा
तीन
बार
करें
और
फिर
उन्हें
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
साष्टाङ्ग
नमस्कारम्
–
उरसा
शिरसा
दृष्ट्या
मनसा
वचसा
तथा
।
पद्भ्यां
कराभ्यां
कर्णाभ्यां
प्रणामोष्टाङ्गमुच्यते
॥
ओं
श्री
______
नमः
साष्टाङ्ग
नमस्कारान्
समर्पयामि
।
(पुरुष
साष्टाङ्गं,
महिला
पञ्चाङ्गं
नमस्कारं
कुर्युः)
सर्वोपचाराः
–
ओं
श्री
______
नमः
छत्रं
आच्छादयामि
।
ओं
श्री
______
नमः
चामरैर्वीजयामि
।
ओं
श्री
______
नमः
नृत्यं
दर्शयामि
।
ओं
श्री
______
नमः
गीतं
श्रावयामि
।
ओं
श्री
______
नमः
आन्दोलिकान्नारोहयामि
।
ओं
श्री
______
नमः
अश्वानारोहयामि
।
ओं
श्री
______
नमः
गजानारोहयामि
।
समस्त
राजोपचारान्
देवोपचारान्
समर्पयामि
।
क्षमाप्रार्थना
–
अपराध
सहस्राणि
क्रियन्तेऽहर्निशं
मया
।
दासोऽयमिति
मां
मत्वा
क्षमस्व
परमेश्वर
।
आवाहनं
न
जानामि
न
जानामि
विसर्जनम्
।
पूजाविधिं
न
जानामि
क्षमस्व
परमेश्वर
।
मन्त्रहीनं
क्रियाहीनं
भक्तिहीनं
जनार्दन
।
यत्पूजितं
मया
देव
परिपूर्णं
तदस्तु
ते
।
(पुष्पाक्षत,
एक
बूंद
जल
दाहिने
हाथ
में
लेकर
ऊपर
का
श्लोक
पढ़कर,
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
अनया
पुरुषसूक्त
सहित
श्रीसूक्त
विधान
पूर्वक
ध्यान
आवाहनादि
षोडशोपचार
पूजया
भगवान्
सर्वात्मकः
श्री
______
सुप्रीता
सुप्रसन्ना
वरदा
भवन्तु
॥
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
तीर्थप्रसाद
स्वीकरण
–
अकालमृत्यहरणं
सर्वव्याधिनिवारणम्
॥
समस्तपापक्षयकरं
श्री
______
पादोदकं
पावनं
शुभम्
॥
श्री
______
नमः
प्रसादं
शीरसा
गृह्णामि
।
(दाहिने
हाथ
में
जल
लेकर,
ऊपर
का
श्लोक
पढ़कर
तीन
बार
तीर्थ
पीएं)
ओं
शान्तिः
शान्तिः
शान्तिः
।