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सुब्रह्मण्य षोडशोपचार पूजा
विधि:
1.
सबसे
पहले
पूर्वाङ्गम्
करें
।
2.
इसके
बाद,
विघ्नेश्वर पूजा
करें
।
3.
उसके
पश्चात,
नीचे
दिए
गए
विस्तृत
पूजा
विधान
का
पालन
करें
।
पुनः
सङ्कल्पम्
–
(पुष्पाक्षत
लेकर
दाहिने
हाथ
में
एक
बूंद
जल
लें
और
नीचे
दिए
गए
संकल्प
का
पाठ
करें)
पूर्वोक्त
एवं
गुण
विशेषण
विशिष्टायां
शुभ
तिथौ
वल्लीदेवसेना
समेत
श्री
सुब्रह्मण्येश्वर
प्रसाद
सिद्ध्यर्थं
स्थिरलक्ष्मी
कीर्तिलाभ
शत्रुपराजयादि
सकलाभीष्ट
सिद्ध्यर्थं
श्री
सुब्रह्मण्येश्वर
ध्यानावहनादि
षोडशोपचार
पूजां
करिष्ये
॥
(इस
प्रकार
पढ़कर
पुष्प
और
अक्षत
को
पात्र
में
रख
दें
और
हाथ
धो
लें)
ध्यानम्
–
षड्वक्त्रं
शिखिवाहनं
त्रिनयनं
चित्राम्बरालङ्कृतं
शक्तिं
वज्रमसिं
त्रिशूलमभयं
खेटं
धनुश्चक्रकम्
।
पाशं
कुक्कुटमङ्कुशं
च
वरदं
हस्तैर्ददानं
सदा
ध्यायेदीप्सित
सिद्धिदं
शिवसुतं
वन्दे
सुराराधितम्
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्यं
ध्यायामि
।
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
आवाहनम्
–
सुब्रह्मण्य
महाभाग
क्रौञ्चाख्यगिरिभेदन
।
आवाहयामि
देव
त्वं
भक्ताभीष्टप्रदो
भव
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्यं
आवाहयामि
।
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
आसनम्
–
अग्निपुत्र
महाभाग
कार्तिकेय
सुरार्चित
।
रत्नसिंहासनं
देव
गृहाण
वरदाव्यय
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
आसनं
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
सिंहासन
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
पाद्यम्
–
गणेशानुज
देवेश
वल्लीकामदविग्रह
।
पाद्यं
गृहाण
गाङ्गेय
भक्त्या
दत्तं
सुरार्चित
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
पादयोः
पाद्यं
समर्पयामि
।
(स्वामी
के
चरण
धोने
का
भाव
करते
हुए,
देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें)
अर्घ्यम्
–
ब्रह्मादि
देवबृन्दानां
प्रणवार्थोपदेशक
।
अर्घ्यं
गृहाण
देवेश
तारकान्तक
षण्मुख
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
हस्तयोरर्घ्यं
समर्पयामि
।
(स्वामी
के
हाथ
धोने
का
भाव
करते
हुए,
देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें)
आचमनीयम्
–
एलाकुङ्कुमकस्तूरीकर्पूरादिसुवासितैः
।
तीर्थैराचम्यतां
देव
गङ्गाधरसुताव्यय
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
आचमनीयं
समर्पयामि
।
(देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें
और
स्वामी
के
मुख
धोकर
जल
पीने
का
भाव
करें)
पञ्चामृत
स्नानम्
–
शर्करा
मधु
गोक्षीर
फलसार
घृतैर्युतम्
।
पञ्चामृतस्नानमिदं
बाहुलेय
गृहाण
भो
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
पञ्चामृतस्नानं
समर्पयामि
।
(घंटानाद
करते
हुए
स्वामी
का
पञ्चामृत
स्नान
कराएँ)
स्नानम्
–
स्वामिन्
शरवणोद्भूत
शूरपद्मासुरान्तक
।
गङ्गादिसलिलैः
स्नाहि
देवसेनामनोहर
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
स्नानं
समर्पयामि
।
(पुष्प
से
स्वामी
पर
देवता
की
पंचपात्र
का
थोड़ा
जल
छिड़क
कर,
उस
पुष्प
को
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें
और
स्वामी
को
स्नान
कराने
का
भाव
करें)
स्नानानन्तरं
शुद्ध
आचमनीयं
समर्पयामि
।
(देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें
और
स्वामी
के
मुख
धोकर
जल
पीने
का
भाव
करें)
वस्त्रम्
–
दुकूलवस्त्रयुगलं
मुक्ताजालसमन्वितम्
।
प्रीत्या
गृहाण
गाङ्गेय
भक्तापद्भञ्जनक्षम
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
वस्त्रयुग्मं
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
वस्त्र
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
यज्ञोपवीतम्
–
राजतं
ब्रह्मसूत्रं
च
काञ्चनं
चोत्तरीयकम्
।
यज्ञोपवीतं
देवेश
गृहाण
सुरनायक
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
उपवीतं
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
यज्ञोपवीत
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
भस्म
–
नित्याग्निहोत्रसम्भूतं
विरजाहोमभावितम्
।
गृहाण
भस्म
हे
स्वामिन्
भक्तानां
भूतिदो
भव
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
भस्म
समर्पयामि
।
(स्वामी
के
मस्तक
पर
भस्म
अलंकृत
करें)
गन्धम्
–
कस्तूरीकुङ्कुमाद्यैश्च
वासितं
सहिमोदकम्
।
गन्धं
विलेपनार्थाय
गृहाण
क्रौञ्चदारण
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
गन्धान्
धारयामि
।
(गंध
को
जल
से
भिगो
कर,
एक
पुष्प
से
स्वामी
पर
छिड़क
कर,
उस
पुष्प
को
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
अक्षतान्
–
अक्षतान्
धवलान्
दिव्यान्
शालेयान्
तण्डुलान्
शुभान्
।
काञ्चनाक्षतसम्युक्तान्
कुमार
प्रतिगृह्यताम्
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
अक्षतान्
समर्पयामि
।
(थोड़े
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
आभरणम्
–
भूषणानि
विचित्राणि
हेमरत्नमयानि
च
।
गृहाण
भुवनाधार
भुक्तिमुक्तिफलप्रद
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
आभरणानि
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
आभूषण
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
को
अर्पित
करें)
पुष्पम्
–
पुन्नग
वकुलाशोक
नीप
पाटल
जाति
च
।
वासन्तिका
बिल्वजाजी
पुष्पाणि
परिगृह्यताम्
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
पुष्पाणि
समर्पयामि
।
(थोड़े
पुष्प
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
अष्टोत्तरशतनाम
पूजा
–
(प्रत्येक
नाम
के
लिए
एक-एक
पुष्प
स्वामी
को
अर्पित
करें,
यदि
पुष्प
उपलब्ध
न
हो
तो
अक्षत
का
उपयोग
करें)
ओं
स्कन्दाय
नमः
ओं
गुहाय
नमः
ओं
षण्मुखाय
नमः
ओं
फालनेत्रसुताय
नमः
ओं
प्रभवे
नमः
ओं
पिङ्गलाय
नमः
ओं
कृत्तिकासूनवे
नमः
ओं
शिखिवाहाय
नमः
ओं
द्विषड्भुजाय
नमः
ओं
द्विषण्णेत्राय
नमः
।
10
ओं
शक्तिधराय
नमः
ओं
पिशिताश
प्रभञ्जनाय
नमः
ओं
तारकासुर
संहारिणे
नमः
ओं
रक्षोबलविमर्दनाय
नमः
ओं
मत्ताय
नमः
ओं
प्रमत्ताय
नमः
ओं
उन्मत्ताय
नमः
ओं
सुरसैन्य
सुरक्षकाय
नमः
ओं
देवसेनापतये
नमः
ओं
प्राज्ञाय
नमः
।
20
ओं
कृपालवे
नमः
ओं
भक्तवत्सलाय
नमः
ओं
उमासुताय
नमः
ओं
शक्तिधराय
नमः
ओं
कुमाराय
नमः
ओं
क्रौञ्चदारणाय
नमः
ओं
सेनान्ये
नमः
ओं
अग्निजन्मने
नमः
ओं
विशाखाय
नमः
ओं
शङ्करात्मजाय
नमः
।
30
ओं
शिवस्वामिने
नमः
ओं
गण
स्वामिने
नमः
ओं
सर्वस्वामिने
नमः
ओं
सनातनाय
नमः
ओं
अनन्तशक्तये
नमः
ओं
अक्षोभ्याय
नमः
ओं
पार्वतीप्रियनन्दनाय
नमः
ओं
गङ्गासुताय
नमः
ओं
शरोद्भूताय
नमः
ओं
आहूताय
नमः
।
40
ओं
पावकात्मजाय
नमः
ओं
जृम्भाय
नमः
ओं
प्रजृम्भाय
नमः
ओं
उज्जृम्भाय
नमः
ओं
कमलासन
संस्तुताय
नमः
ओं
एकवर्णाय
नमः
ओं
द्विवर्णाय
नमः
ओं
त्रिवर्णाय
नमः
ओं
सुमनोहराय
नमः
ओं
चतुर्वर्णाय
नमः
।
50
ओं
पञ्चवर्णाय
नमः
ओं
प्रजापतये
नमः
ओं
अहस्पतये
नमः
ओं
अग्निगर्भाय
नमः
ओं
शमीगर्भाय
नमः
ओं
विश्वरेतसे
नमः
ओं
सुरारिघ्ने
नमः
ओं
हरिद्वर्णाय
नमः
ओं
शुभकराय
नमः
ओं
पटवे
नमः
।
60
ओं
वटुवेषभृते
नमः
ओं
पूष्णे
नमः
ओं
गभस्तये
नमः
ओं
गहनाय
नमः
ओं
चन्द्रवर्णाय
नमः
ओं
कलाधराय
नमः
ओं
मायाधराय
नमः
ओं
महामायिने
नमः
ओं
कैवल्याय
नमः
ओं
शङ्करात्मजाय
नमः
।
70
ओं
विश्वयोनये
नमः
ओं
अमेयात्मने
नमः
ओं
तेजोनिधये
नमः
ओं
अनामयाय
नमः
ओं
परमेष्ठिने
नमः
ओं
परस्मै
ब्रह्मणे
नमः
ओं
वेदगर्भाय
नमः
ओं
विराट्सुताय
नमः
ओं
पुलिन्दकन्याभर्त्रे
नमः
ओं
महासारस्वतावृताय
नमः
।
80
ओं
आश्रिताखिलदात्रे
नमः
ओं
चोरघ्नाय
नमः
ओं
रोगनाशनाय
नमः
ओं
अनन्तमूर्तये
नमः
ओं
आनन्दाय
नमः
ओं
शिखिण्डिकृत
केतनाय
नमः
ओं
डम्भाय
नमः
ओं
परमडम्भाय
नमः
ओं
महाडम्भाय
नमः
ओं
वृषाकपये
नमः
।
90
ओं
कारणोपात्तदेहाय
नमः
ओं
कारणातीतविग्रहाय
नमः
ओं
अनीश्वराय
नमः
ओं
अमृताय
नमः
ओं
प्राणाय
नमः
ओं
प्राणायामपरायणाय
नमः
ओं
विरुद्धहन्त्रे
नमः
ओं
वीरघ्नाय
नमः
ओं
रक्तश्यामगलाय
नमः
ओं
सुब्रह्मण्याय
नमः
।
100
ओं
गुहाय
नमः
ओं
प्रीताय
नमः
ओं
ब्राह्मण्याय
नमः
ओं
ब्राह्मणप्रियाय
नमः
ओं
वंशवृद्धिकराय
नमः
ओं
वेदाय
नमः
ओं
वेद्याय
नमः
ओं
अक्षयफलप्रदाय
नमः
।
108
धूपम्
–
दशाङ्गं
गुग्गुलूपेतं
सुगन्धं
सुमनोहरम्
।
कपिलाघृतसम्युक्तं
धूपं
गृह्णीष्व
षण्मुख
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
धूपमाघ्रापयामि
।
(घंटानाद
करते
हुए
स्वामी
को
जलाई
हुई
अगरबत्ती
दिखाएं)
दीपम्
–
साज्यं
त्रिवर्तिसम्युक्तं
वह्निना
योजितं
मया
।
दीपं
गृहाण
स्कन्देश
त्रैलोक्यतिमिरापहम्
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
दीपं
दर्शयामि
।
धूपदीपानन्तरं
शुद्धाचमनीयं
समर्पयामि
।
(घंटानाद
करते
हुए
स्वामी
को
जलाया
हुआ
दीपक
दिखाएं)
नैवेद्यम्
–
लेह्यं
चोष्यं
च
भोज्यं
च
पानीयं
षड्रसान्वितम्
।
भक्ष्यशाकादिसम्युक्तं
नैवेद्यं
स्कन्द
गृह्यताम्
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
नैवेद्यं
समर्पयामि
।
(घंटानाद
करते
हुए,
नीचे
का
मंत्र
बोलते
हुए
पुष्प
से
जल
को
नैवेद्य
के
चारों
ओर
3
बार
दक्षिणावर्त
दिशा
में
छिड़कें)
ओं
भूर्भुव॒स्सुव॑:
।
तत्स॑वि॒तुर्वरे᳚ण्यं॒
भर्गो॑
दे॒वस्य॑
धीमहि
।
धियो॒
यो
न॑:
प्रचो॒दया᳚त्
॥
सत्यं
त्वा
ऋतेन
परिषिञ्चामि
(पुष्प
से
नैवेद्य
पर
जल
छिड़कें)
(सायङ्काले)
–
ऋतं
त्वा
सत्येन
परिषिञ्चामि
(पुष्प
से
नैवेद्य
पर
जल
छिड़कें)
अमृतमस्तु
।
अमृतोपस्तरणमसि
।
(उस
पुष्प
को
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
ओं
प्राणाय
स्वाहा
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
अपानाय
स्वाहा
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
व्यानाय
स्वाहा
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
उदानाय
स्वाहा
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
समानाय
स्वाहा
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
(नीचे
के
मंत्र
बोलते
हुए
पुष्प
से
जल
को
देवता
के
ऊपर
5
बार
छिड़कें)
मध्ये
मध्ये
पानीयं
समर्पयामि
।
अ॒मृ॒ता॒पि॒धा॒नम॑सि
।
उत्तरापोशनं
समर्पयामि
।
हस्तौ
प्रक्षालयामि
।
पादौ
प्रक्षालयामि
।
शुद्धाचमनीयं
समर्पयामि
।
ताम्बूलम्
–
पूगीफलसमायुक्तं
नागवल्लीदलैर्युतम्
।
कर्पूरचूर्णसम्युक्तं
ताम्बूलं
प्रतिगृह्यताम्
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
ताम्बूलं
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
ताम्बूल
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
नीराजनम्
–
देवसेनापते
स्कन्द
संसारध्वान्तभारक
।
नीराजनमिदं
देव
गृह्यतां
सुरसत्तम
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
कर्पूरनीराजनं
दर्शयामि
।
(घंटानाद
करते
हुए
स्वामी
को
कपूर
की
आरती
दें)
मन्त्रपुष्पम्
–
ओं
तत्पुरुषाय
विद्महे
महासेनाय
धीमहि
।
तन्नो
स्कन्दः
प्रचोदयात्
।
पुष्पाञ्जलिं
प्रदास्यामि
भक्ताभीष्टप्रदायक
।
गृहाणवल्लीरमण
सुप्रीतेनान्तरात्मना
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
पुष्पाञ्जलिं
समर्पयामि
।
नीराजनानन्तरं
शुद्धाचमनीयं
समर्पयामि
।
नमस्करोमि
।
(देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें
और
स्वामी
के
मुख
धोकर
जल
पीने
का
भाव
करें)
आत्मप्रदक्षिण
–
यानि
कानि
च
पापानि
जन्मान्तरकृतानि
च
।
तानि
तानि
प्रणश्यन्ति
प्रदक्षिण
पदे
पदे
॥
पापोऽहं
पापकर्माऽहं
पापात्मा
पापसम्भव
।
त्राहिमां
कृपया
देव
शरणागतवत्सल
॥
अन्यथा
शरणं
नास्ति
त्वमेव
शरणं
मम
।
तस्मात्कारुण्य
भावेन
रक्ष
रक्ष
सुरेश्वर
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
आत्मप्रदक्षिण
नमस्कारं
समर्पयामि
।
(अक्षत
और
पुष्प
लेकर,
आत्म
प्रदक्षिणा
तीन
बार
करें
और
फिर
उन्हें
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
नमस्कारम्
–
षडाननं
कुङ्कुमरक्तवर्णं
द्विषड्भुजं
बालकमम्बिकासुतम्
।
रुद्रस्य
सूनुं
सुरसैन्यनाथं
गुहं
सदाऽहं
शरणं
प्रपद्ये
॥
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
प्रार्थना
नमस्कारान्
समर्पयामि
।
(नमस्कार
करें)
राजोपचार
पूजा
–
ओं
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
।
छत्रमाच्छादयामि
।
चामरैर्वीजयामि
।
गीतं
श्रावयामि
।
नृत्यं
दर्शयामि
।
वाद्यं
घोषयामि
।
आन्दोलिकान्
आरोहयामि
।
अश्वान्
आरोहयामि
।
गजान्
आरोहयामि
।
ओं
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
।
समस्त
राजोपचारान्
देवोपचारान्
समर्पयामि
।
अर्घ्यम्
–
देवसेनापते
स्वामिन्
सेनानीरखिलेष्टद
।
इदमर्घ्यं
प्रदास्यामि
सुप्रीतो
भव
सर्वदा
॥
ओं
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
।
इदमर्घ्यं
इदमर्घ्यं
इदमर्घ्यम्
॥
1
॥
चन्द्रात्रेय
महाभाग
सोम
सोमविभूषण
।
इदमर्घ्यं
प्रदास्यामि
सुप्रीतो
भव
सर्वदा
॥
ओं
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
।
इदमर्घ्यं
इदमर्घ्यं
इदमर्घ्यम्
॥
2
॥
नीलकण्ठ
महाभाग
सुब्रह्मण्यसुवाहन
।
इदमर्घ्यं
प्रदास्यामि
सुप्रीतो
भव
सर्वदा
॥
ओं
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्याय
नमः
।
इदमर्घ्यं
इदमर्घ्यं
इदमर्घ्यम्
॥
3
॥
(स्वामी
के
हाथ
धोने
का
भाव
करते
हुए,
देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें)
क्षमाप्रार्थना
–
मन्त्रहीनं
क्रियाहीनं
भक्तिहीनं
सुरेश्वर
।
यत्पूजितं
मया
देव
परिपूर्णं
तदस्तु
ते
॥
(पुष्पाक्षत,
एक
बूंद
जल
दाहिने
हाथ
में
लेकर
ऊपर
का
श्लोक
पढ़कर,
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
अनया
ध्यानावाहनादि
षोडशोपचार
पूजया
भगवान्
सर्वात्मकः
श्रीवल्लीदेवसेना
समेत
श्रीसुब्रह्मण्य
स्वामि
सुप्रीतो
सुप्रसन्नो
वरदो
भवतु
॥
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
ओं
शान्तिः
शान्तिः
शान्तिः
॥
Recite with devotion and pure heart
Regular practice brings spiritual benefits