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शिव षोडशोपचार पूजा
विधि:
1.
सबसे
पहले
पूर्वाङ्गम्
करें
।
2.
इसके
बाद,
विघ्नेश्वर पूजा
करें
।
3.
उसके
पश्चात,
नीचे
दिए
गए
विस्तृत
पूजा
विधान
का
पालन
करें
।
पुनः
सङ्कल्पम्
–
(पुष्पाक्षत
लेकर
दाहिने
हाथ
में
एक
बूंद
जल
लें
और
नीचे
दिए
गए
संकल्प
का
पाठ
करें)
पूर्वोक्त
एवं
गुणविशेषण
विशिष्टायां
शुभतिथौ
श्री
उमामहेश्वर
मुद्दिश्य
श्री
उमामहेश्वर
प्रीत्यर्थं
यावच्छक्ति
ध्यानावाहनादि
षोडशोपचार
पूजां
करिष्ये
॥
(इस
प्रकार
पढ़कर
पुष्प
और
अक्षत
को
पात्र
में
रख
दें
और
हाथ
धो
लें)
प्राणप्रतिष्ठा
–
ओं
असु॑नीते॒
पुन॑र॒स्मासु॒
चक्षु॒:
पुन॑:
प्रा॒णमि॒ह
नो᳚
धेहि॒
भोग᳚म्
।
ज्योक्प॑श्येम॒
सूर्य॑मु॒च्चर᳚न्त॒
मनु॑मते
मृ॒डया᳚
नः
स्व॒स्ति
।
अ॒मृतं॒
वै
प्रा॒णा
अ॒मृत॒माप॑:
प्रा॒णाने॒व
य॑थास्था॒नमुप॑ह्वयते
॥
स्थिरो
भव
।
वरदो
भव
।
सुमुखो
भव
।
सुप्रसन्नो
भव
।
स्थिरासनं
कुरु
॥
स्वामिन्
सर्व
जगन्नाथ
यावत्पूजाऽवसानकम्
।
तावत्त्वं
प्रीति
भावेन
लिङ्गेऽस्मिन्
सन्निधिं
कुरु
॥
ओं
त्र्य॑म्बकं
यजामहे
सुग॒न्धिं
पु॑ष्टि॒
वर्ध॑नम्
।
उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒
बन्ध॑नान्मृ॒त्योर्मु॑क्षीय॒
माऽमृता᳚त्
॥
अस्मिन्
लिङ्गे
श्रीउमामहेश्वर
स्वामिनमावाहयामि
स्थापयामि
।
ततः
प्राण
प्रतिष्ठापनं
करिष्ये
॥
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
ध्यानम्
–
शांतं
पद्मासनस्थं
शशिधरमुकुटं
पंचवक्त्रं
त्रिनेत्रं
शूलं
वज्रं
च
खड्गं
परशुमभयदं
दक्षभागे
वहंतम्
।
नागं
पाशं
च
घंटां
प्रलयहुतवहं
सांकुशं
वामभागे
नानालंकारयुक्तं
स्फटिकमणिनिभं
पार्वतीशं
नमामि
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
ध्यायामि
।
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
आवाहनम्
–
(ओं
स॒द्योजा॒त-म्प्र॑पद्या॒मि)
ओङ्काराय
नमस्तुभ्यं
ओङ्कारप्रिय
शङ्कर
।
आवाहन-ङ्गृहाणेद-म्पार्वतीप्रिय
वल्लभ
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
आवाहयामि
।
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
आसनम्
–
(ओं
स॒द्योजा॒ताय॒वै
नमो॒
नमः॑)
महादेव
जगन्नाथ
भक्तानामभयप्रद
।
पाद्य-ङ्गृहाण
देवेश
मम
सौख्यं-विँवर्धय
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
नवरत्नखचित
सुवर्ण
सिंहासनं
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
सिंहासन
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
पाद्यम्
–
(ओ-म्भवे
भ॑वे॒न)
या
ते॑
रुद्र
शि॒वा
त॒नूरघो॒राऽपा॑पकाशिनी
।
तया॑
नस्त॒नुवा॒
शंत॑मया॒
गिरि॑शंता॒भिचा॑कशीहि
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
पादयोः
पाद्यं
समर्पयामि
।
(स्वामी
के
चरण
धोने
का
भाव
करते
हुए,
देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें)
अर्घ्यम्
–
(ओं
अति॑
भवे
भवस्व॒मां)
शिवाप्रिय
नमस्तेस्तु
पावन-ञ्जलपूरितम्
।
अर्घ्य-ङ्गृहाण
भगव-न्गाङ्गेय
कलशस्थितम्
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
हस्तयोः
अर्घ्यं
समर्पयामि
।
(स्वामी
के
हाथ
धोने
का
भाव
करते
हुए,
देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें)
आचमनीयम्
–
(ओ-म्भ॒वोद्भ॑वाय॒
नमः)
वामदेव
सुराधीश
वन्दिताङ्घ्रि
सरोरुह
।
गृहाणाचमन-न्देव
करुणा
वरुणालय
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
मुखे
आचमनीयं
समर्पयामि
।
(देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें
और
स्वामी
के
मुख
धोकर
जल
पीने
का
भाव
करें)
मधुपर्कम्
–
यमान्तकाय
उग्राय
भीमाय
च
नमो
नमः
।
मधुपर्क-म्प्रदास्यामि
गृहाण
त्वमुमापते
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
मुखे
आचमनीयं
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
मधुपर्क
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
पञ्चामृत
स्नानम्
–
आप्या॑यस्व॒
समे॑तु
ते
वि॒श्वत॑स्सोम॒
वृष्णि॑यम्
।
भवा॒
वाज॑स्य
सङ्ग॒थे
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
क्षीरेण
स्नपयामि
।
(गाय
के
दूध
से
अभिषेक
कर
के
तेल
या
घी
के
दीप
से
आरती
दें)
(जल
से
अभिषेक
कर
के
प्रतिमा
को
शुद्ध
करें)
द॒धि॒क्राव्णो॑
अकारिषं
जि॒ष्णोरश्व॑स्य
वा॒जिन॑:
।
सु॒र॒भि
नो॒
मुखा॑
कर॒त्प्राण॒
आयूग्ं॑षि
तारिषत्
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
दध्ना
स्नपयामि
।
(गाय
के
दही
से
अभिषेक
कर
के
तेल
या
घी
के
दीप
से
आरती
दें)
(जल
से
अभिषेक
कर
के
प्रतिमा
को
शुद्ध
करें)
शु॒क्रम॑सि॒
ज्योति॑रसि॒
तेजो॑सि
दे॒वोव॑स्सवि॒तोत्पु॑ना॒तु
अच्छि॑द्रेण
प॒वित्रे॑ण॒
वसो॒स्सूर्य॑स्य
र॒श्मिभि॑:
।
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
आज्येन
स्नपयामि
।
(गाय
के
घी
से
अभिषेक
कर
के
तेल
या
घी
के
दीप
से
आरती
दें)
(जल
से
अभिषेक
कर
के
प्रतिमा
को
शुद्ध
करें)
मधु॒वाता॑
ऋताय॒ते
मधु॑क्षरन्ति॒
सिन्ध॑वः
।
माध्वी᳚र्नः
स॒न्त्वौष॑धीः
।
मधु॒नक्त॑मु॒तोष॑सि॒
मधु॑म॒त्
पार्थि॑व॒ग्ं॒रज॑:
।
मधु॒द्यौर॑स्तु
नः
पि॒ता
।
मधु॑मान्नो॒
वन॒स्पति॒र्मधु॑माग्ं
अस्तु॒
सूर्य॑:
।
माध्वी॒र्गावो॑
भवन्तु
नः
।
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
मधुना
स्नपयामि
।
(शहद
से
अभिषेक
कर
के
तेल
या
घी
के
दीप
से
आरती
दें)
(जल
से
अभिषेक
कर
के
प्रतिमा
को
शुद्ध
करें)
स्वा॒दुः
प॑वस्व
दि॒व्याय॒
जन्म॑ने
।
स्वा॒दुरिन्द्रा᳚य
सु॒हवी᳚तु
नाम्ने
।
स्वा॒दुर्मि॒त्राय॒
वरु॑णाय
वा॒यवे॒
।
बृह॒स्पत॑ये॒
मधु॑मां॒
अदा᳚भ्यः
।
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
शर्करेण
स्नपयामि
।
(चीनी
से
अभिषेक
कर
के
तेल
या
घी
के
दीप
से
आरती
दें)
(जल
से
अभिषेक
कर
के
प्रतिमा
को
शुद्ध
करें)
याः
फ॒लिनी॒र्या
अ॑फ॒ला
अ॑पु॒ष्पायाश्च॑
पु॒ष्पिणी॑:
।
बृह॒स्पति॑
प्रसूता॒स्तानो॑
मुन्च॒न्त्वग्ं
ह॑सः
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
फलोदकेन
स्नपयामि
।
(फलों
के
रस
से
अभिषेक
कर
के
तेल
या
घी
के
दीप
से
आरती
दें)
(जल
से
अभिषेक
कर
के
प्रतिमा
को
शुद्ध
करें)
स्नानम्
–
आपो॒
हिष्ठा
म॑यो॒भुव॒स्ता
न॑
ऊ॒र्जे
द॑धातन
।
म॒हेरणा॑य॒
चक्ष॑से
।
यो
व॑:
शि॒वत॑मो
रस॒स्तस्य॑
भाजयते॒
ह
न॑:
।
उ॒श॒तीरि॑व
मा॒त॑रः
।
तस्मा॒
अर॑ङ्गमामवो॒
यस्य॒
क्षया॑य॒
जिन्व॑थ
।
आपो॑
ज॒नय॑था
च
नः
।
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
शुद्धोदक
स्नानं
समर्पयामि
।
(पुष्प
से
स्वामी
पर
देवता
की
पंचपात्र
का
थोड़ा
जल
छिड़क
कर,
उस
पुष्प
को
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें
और
स्वामी
को
स्नान
कराने
का
भाव
करें)
स्नानानन्तरं
शुद्ध
आचमनीयं
समर्पयामि
।
(देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें
और
स्वामी
के
मुख
धोकर
जल
पीने
का
भाव
करें)
वस्त्रम्
–
(ओ-ञ्ज्ये॒ष्ठाय॒
नमः)
नमो
नागविभूषाय
नारदादि
स्तुताय
च
।
वस्त्रयुग्म-म्प्रदास्यामि
पार्थिवेश्वर
स्वीकुरु
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
वस्त्रयुग्मं
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
वस्त्र
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
यज्ञोपवीतम्
–
(ओं
श्रे॒ष्ठाय॒
नमः)
यज्ञेश
यज्ञविध्वंस
सर्वदेव
नमस्कृत
।
यज्ञसूत्र-म्प्रदास्यामि
शोभन-ञ्चोत्तरीयकम्
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
यज्ञोपवीतं
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
यज्ञोपवीत
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
आभरणम्
–
(ओं
रु॒द्राय॒
नमः)
नागाभरण
विश्वेश
चन्द्रार्धकृतमस्तक
।
पार्थिवेश्वर
मद्दत्त-ङ्गृहाणाभरणं-विँभो
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
सर्वाभरणानि
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
आभूषण
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
को
अर्पित
करें)
गन्धम्
–
(ओ-ङ्काला॑य॒
नमः॑)
श्री
गन्ध-न्ते
प्रयच्छामि
गृहाण
परमेश्वर
।
कस्तूरि
कुङ्कुमोपेतं
शिवाश्लिष्ट
भुजद्वय
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
दिव्य
श्री
चन्दनं
समर्पयामि
।
(गंध
को
जल
से
भिगो
कर,
एक
पुष्प
से
स्वामी
पर
छिड़क
कर,
उस
पुष्प
को
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
अक्षतान्
–
(ओ-ङ्कल॑विकरणाय॒
नमः)
अक्षता-न्धवला-न्दिव्यान्
शालि
तुण्डुल
मिश्रितान्
।
अक्षतोसि
स्वभावेन
स्वीकुरुष्व
महेश्वर
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
अक्षतान्
समर्पयामि
।
(थोड़े
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
पुष्पाणि
–
(ओ-म्बल॑
विकरणाय॒
नमः)
सुगन्धीनि
सुपुष्पाणि
जाजीबिल्वार्क
चम्पकैः
।
निर्मित-म्पुष्पमालञ्च
नीलकण्ठ
गृहाण
भो
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
नानाविध
परिमल
पत्र
पुष्पाणि
समर्पयामि
।
(थोड़े
पुष्प
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
अष्टोत्तर
शत
नामावली
–
(प्रत्येक
नाम
के
लिए
एक-एक
पुष्प
स्वामी
को
अर्पित
करें,
यदि
पुष्प
उपलब्ध
न
हो
तो
अक्षत
का
उपयोग
करें)
ओं
शिवाय
नमः
ओं
महेश्वराय
नमः
ओं
शंभवे
नमः
ओं
पिनाकिने
नमः
ओं
शशिशेखराय
नमः
ओं
वामदेवाय
नमः
ओं
विरूपाक्षाय
नमः
ओं
कपर्दिने
नमः
ओं
नीललोहिताय
नमः
ओं
शंकराय
नमः
।
10
।
ओं
शूलपाणये
नमः
ओं
खट्वांगिने
नमः
ओं
विष्णुवल्लभाय
नमः
ओं
शिपिविष्टाय
नमः
ओं
अंबिकानाथाय
नमः
ओं
श्रीकंठाय
नमः
ओं
भक्तवत्सलाय
नमः
ओं
भवाय
नमः
ओं
शर्वाय
नमः
ओं
त्रिलोकेशाय
नमः
।
20
।
ओं
शितिकंठाय
नमः
ओं
शिवाप्रियाय
नमः
ओं
उग्राय
नमः
ओं
कपालिने
नमः
ओं
कामारये
नमः
ओं
अंधकासुर
सूदनाय
नमः
ओं
गंगाधराय
नमः
ओं
ललाटाक्षाय
नमः
ओं
कालकालाय
नमः
ओं
कृपानिधये
नमः
।
30
।
ओं
भीमाय
नमः
ओं
परशुहस्ताय
नमः
ओं
मृगपाणये
नमः
ओं
जटाधराय
नमः
ओं
कैलासवासिने
नमः
ओं
कवचिने
नमः
ओं
कठोराय
नमः
ओं
त्रिपुरांतकाय
नमः
ओं
वृषांकाय
नमः
ओं
वृषभारूढाय
नमः
।
40
।
ओं
भस्मोद्धूलित
विग्रहाय
नमः
ओं
सामप्रियाय
नमः
ओं
स्वरमयाय
नमः
ओं
त्रयीमूर्तये
नमः
ओं
अनीश्वराय
नमः
ओं
सर्वज्ञाय
नमः
ओं
परमात्मने
नमः
ओं
सोमसूर्याग्नि
लोचनाय
नमः
ओं
हविषे
नमः
ओं
यज्ञमयाय
नमः
।
50
।
ओं
सोमाय
नमः
ओं
पंचवक्त्राय
नमः
ओं
सदाशिवाय
नमः
ओं
विश्वेश्वराय
नमः
ओं
वीरभद्राय
नमः
ओं
गणनाथाय
नमः
ओं
प्रजापतये
नमः
ओं
हिरण्यरेतसे
नमः
ओं
दुर्धर्षाय
नमः
ओं
गिरीशाय
नमः
।
60
।
ओं
गिरिशाय
नमः
ओं
अनघाय
नमः
ओं
भुजंग
भूषणाय
नमः
ओं
भर्गाय
नमः
ओं
गिरिधन्वने
नमः
ओं
गिरिप्रियाय
नमः
ओं
कृत्तिवाससे
नमः
ओं
पुरारातये
नमः
ओं
भगवते
नमः
ओं
प्रमथाधिपाय
नमः
।
70
।
ओं
मृत्युंजयाय
नमः
ओं
सूक्ष्मतनवे
नमः
ओं
जगद्व्यापिने
नमः
ओं
जगद्गुरवे
नमः
ओं
व्योमकेशाय
नमः
ओं
महासेन
जनकाय
नमः
ओं
चारुविक्रमाय
नमः
ओं
रुद्राय
नमः
ओं
भूतपतये
नमः
ओं
स्थाणवे
नमः
।
80
।
ओं
अहिर्बुध्न्याय
नमः
ओं
दिगंबराय
नमः
ओं
अष्टमूर्तये
नमः
ओं
अनेकात्मने
नमः
ओं
सात्त्विकाय
नमः
ओं
शुद्धविग्रहाय
नमः
ओं
शाश्वताय
नमः
ओं
खंडपरशवे
नमः
ओं
अजाय
नमः
ओं
पाशविमोचकाय
नमः
।
90
।
ओं
मृडाय
नमः
ओं
पशुपतये
नमः
ओं
देवाय
नमः
ओं
महादेवाय
नमः
ओं
अव्ययाय
नमः
ओं
हरये
नमः
ओं
पूषदंतभिदे
नमः
ओं
अव्यग्राय
नमः
ओं
दक्षाध्वरहराय
नमः
ओं
हराय
नमः
।
100
।
ओं
भगनेत्रभिदे
नमः
ओं
अव्यक्ताय
नमः
ओं
सहस्राक्षाय
नमः
ओं
सहस्रपादे
नमः
ओं
अपवर्गप्रदाय
नमः
ओं
अनंताय
नमः
ओं
तारकाय
नमः
ओं
परमेश्वराय
नमः
।
108
।
धूपम्
–
(ओ-म्बला॑य॒
नमः)
दशाङ्गं
धूपमुख्यं
च
ह्यङ्गार
विनिवेशितम्
।
धूपं
सुगन्धैरुत्पन्नं
त्वां
प्रीणयतु
शङ्कर
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
धूपं
समर्पयामि
।
(घंटानाद
करते
हुए
स्वामी
को
जलाई
हुई
अगरबत्ती
दिखाएं)
दीपम्
–
(ओ-म्बल॑
प्रमथनाय॒
नमः)
योगिनां
हृदयेष्वेव
ज्ञान
दीपाङ्कुरोह्यसि
।
बाह्य
दीपो
मयादत्तः
गृह्यतां
भक्त
गौरवात्
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
दीपं
समर्पयामि
।
(घंटानाद
करते
हुए
स्वामी
को
जलाया
हुआ
दीपक
दिखाएं)
धूप
दीपानंतरं
आचमनीयं
समर्पयामि
।
(देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें
और
स्वामी
के
मुख
धोकर
जल
पीने
का
भाव
करें)
नैवेद्यम्
–
(ओं
सर्व॑
भूत
दमनाय॒
नमः)
नैवेद्यं
षड्रसोपेतं
घृत
भक्ष्य
समन्वितम्
।
भक्त्या
ते
सम्प्रदास्यामि
गृहाण
परमेश्वर
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
नैवेद्यं
समर्पयामि
।
(घंटानाद
करते
हुए,
नीचे
का
मंत्र
बोलते
हुए
पुष्प
से
जल
को
नैवेद्य
के
चारों
ओर
3
बार
दक्षिणावर्त
दिशा
में
छिड़कें)
ओं
भूर्भुव॑स्सुव॑:
।
तत्स॑वितु॒र्वरे᳚ण्य॒म्
।
भ॒र्गो॑
दे॒वस्य॑
धी॒महि
।
धियो॒
योन॑:
प्रचो॒दया᳚त्
॥
सत्यं
त्वा
ऋतेन
परिषिञ्चामि
(पुष्प
से
नैवेद्य
पर
जल
छिड़कें)
(सायङ्काले)
–
ऋतं
त्वा
सत्येन
परिषिञ्चामि
(पुष्प
से
नैवेद्य
पर
जल
छिड़कें)
अमृतमस्तु
।
अमृतोपस्तरणमसि
।
(उस
पुष्प
को
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
ओं
प्राणाय
स्वाहा
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
अपानाय
स्वाहा
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
व्यानाय
स्वाहा
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
उदानाय
स्वाहा
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
समानाय
स्वाहा
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
(नीचे
के
मंत्र
बोलते
हुए
पुष्प
से
जल
को
देवता
के
ऊपर
5
बार
छिड़कें)
मध्ये
मध्ये
पानीयं
समर्पयामि
।
अ॒मृ॒ता॒पि॒धा॒नम॑सि
।
उत्तरापोशनं
समर्पयामि
।
हस्तौ
प्रक्षालयामि
।
पादौ
प्रक्षालयामि
।
शुद्धाचमनीयं
समर्पयामि
।
ताम्बूलम्
–
(ओ-म्म॒नोन्म॑नाय॒
नमः)
ताम्बूलं
भवतां
देव
अर्पयाम्यद्य
शङ्कर
।
पूगीफल
समायुक्तं
नागवल्ली
दलैर्युतम्
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
ताम्बूलं
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
ताम्बूल
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
नीराजनम्
–
श्री
शंभ॑वे॒
नमः॑
॥
नम॑स्ते
अस्तु
भगवन्-विश्वेश्व॒राय॑
महादे॒वाय॑
त्र्यंब॒काय॑
त्रिपुरांत॒काय॑
त्रिकाग्निका॒लाय॑
कालाग्निरु॒द्राय॑
नीलकं॒ठाय॑
मृत्युंज॒याय॑
सर्वेश्व॒राय॑
सदाशि॒वाय॑
[शंक॒राय॑]
श्रीमन्-महादे॒वाय॒
नमः॑
।
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
कर्पूर
नीराजनं
समर्पयामि
।
(घंटानाद
करते
हुए
स्वामी
को
कपूर
की
आरती
दें)
नीराजनानन्तरं
शुद्धाचमनीयं
समर्पयामि
।
नमस्करोमि
।
(देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें
और
स्वामी
के
मुख
धोकर
जल
पीने
का
भाव
करें)
मन्त्रपुष्पम्
–
ओं
तत्पुरुषाय
विद्महे
महादेवाय
धीमहि
तन्नो
रुद्रः
प्रचोदयात्
।
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
सुवर्ण
दिव्य
मन्त्रपुष्पं
समर्पयामि
।
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
आत्मप्रदक्षिण
–
यानिकानि
च
पापानि
जन्मान्तरकृतानि
च
तानि
तानि
प्रणश्यन्ति
प्रदक्षिण
पदे
पदे
।
पापोऽहं
पापकर्माऽहं
पापात्मा
पापसम्भव
।
त्राहि
मां
कृपया
देव
शरणागतवत्सला
।
अन्यथा
शरणं
नास्ति
त्वमेव
शरणं
मम
।
तस्मात्कारुण्य
भावेन
रक्ष
रक्ष
जनार्दना
।
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
आत्मप्रदक्षिण
नमस्कारान्
समर्पयामि
।
(अक्षत
और
पुष्प
लेकर,
आत्म
प्रदक्षिणा
तीन
बार
करें
और
फिर
उन्हें
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
साष्टाङ्ग
नमस्कारम्
–
उरसा
शिरसा
दृष्ट्या
मनसा
वचसा
तथा
।
पद्भ्यां
कराभ्यां
कर्णाभ्यां
प्रणामोष्टाङ्गमुच्यते
॥
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
साष्टाङ्ग
नमस्कारान्
समर्पयामि
।
(पुरुष
साष्टाङ्गं,
महिला
पञ्चाङ्गं
नमस्कारं
कुर्युः)
सर्वोपचाराः
–
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
छत्रं
आच्छादयामि
।
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
चामरैर्वीजयामि
।
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
नृत्यं
दर्शयामि
।
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
गीतं
श्रावयामि
।
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
आन्दोलिकान्नारोहयामि
।
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
अश्वानारोहयामि
।
ओं
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
गजानारोहयामि
।
समस्त
राजोपचारान्
देवोपचारान्
समर्पयामि
।
क्षमाप्रार्थना
–
अपराध
सहस्राणि
क्रियन्तेऽहर्निशं
मया
।
दासोऽयमिति
मां
मत्वा
क्षमस्व
परमेश्वर
।
आवाहनं
न
जानामि
न
जानामि
विसर्जनम्
।
पूजाविधिं
न
जानामि
क्षमस्व
परमेश्वर
।
मन्त्रहीनं
क्रियाहीनं
भक्तिहीनं
जनार्दन
।
यत्पूजितं
मया
देव
परिपूर्णं
तदस्तु
ते
।
(पुष्पाक्षत,
एक
बूंद
जल
दाहिने
हाथ
में
लेकर
ऊपर
का
श्लोक
पढ़कर,
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
अनया
ध्यान
आवाहनादि
षोडशोपचार
पूजया
भगवान्
सर्वात्मकः
श्री
उमामहेश्वर
सुप्रीता
सुप्रसन्ना
वरदा
भवन्तु
॥
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
तीर्थप्रसाद
स्वीकरण
–
अकालमृत्यहरणं
सर्वव्याधिनिवारणम्
॥
समस्तपापक्षयकरं
श्री
परमेश्वर
पादोदकं
पावनं
शुभम्
॥
श्री
उमामहेश्वराभ्याम्
नमः
प्रसादं
शीरसा
गृह्णामि
।
(दाहिने
हाथ
में
जल
लेकर,
ऊपर
का
श्लोक
पढ़कर
तीन
बार
तीर्थ
पीएं)
ओं
शान्तिः
शान्तिः
शान्तिः
।
Recite with devotion and pure heart
Regular practice brings spiritual benefits