विधि:
3. उसके पश्चात, नीचे दिए गए विस्तृत पूजा विधान का पालन करें।
पुनः सङ्कल्पम् –
(पुष्पाक्षत लेकर दाहिने हाथ में एक बूंद जल लें और नीचे दिए गए संकल्प का पाठ करें)
पूर्वोक्त एवं गुणविशेषण विशिष्टायां शुभतिथौ श्री आञ्जनेय मुद्दिश्य श्री आञ्जनेय प्रीत्यर्थं यावच्छक्ति ध्यानावाहनादि षोडशोपचार पूजां करिष्ये ॥
(इस प्रकार पढ़कर पुष्प और अक्षत को पात्र में रख दें और हाथ धो लें)
ध्यानम् –
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः ध्यायामि ।
(थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
आवाहनम् –
रामचन्द्रपदाम्भोजयुगल स्थिरमासनम् ।
आवाहयामि वरदं हनूमन्तमभीष्टदम् ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः आवाहयामि ।
(थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
आसनम् –
नवरत्ननिबद्धाश्रं चतुरश्रं सुशोभनम् ।
सौवर्णमासनं तुभ्यं दास्यामि कपिनायक ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः नवरत्नखचित सुवर्ण सिंहासनं समर्पयामि ।
(स्वामी को सिंहासन अर्पित करने का भाव करते हुए, थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
पाद्यम् –
सुवर्णकलशानीतं गङ्गादि सलिलैर्युतम् ।
पादयोः पाद्यमनघं प्रतिगृह्य प्रसीद मे ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि ।
(स्वामी के चरण धोने का भाव करते हुए, देवता की पंचपात्र का जल उद्दरणी से स्वामी को दिखाकर दूसरे पात्र में छोड़ दें)
अर्घ्यम् –
लक्ष्मणप्राणसंरक्ष सीताशोकविनाशन ।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं अञ्जनाप्रियनन्दन ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः हस्तयोः अर्घ्यं समर्पयामि ।
(स्वामी के हाथ धोने का भाव करते हुए, देवता की पंचपात्र का जल उद्दरणी से स्वामी को दिखाकर दूसरे पात्र में छोड़ दें)
आचमनीयम् –
वालाग्रसेतुबन्धाय शताननवधाय च ।
तुभ्यमाचमनं दत्तं प्रतिगृह्णीष्व मारुते ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः मुखे आचमनीयं समर्पयामि ।
(देवता की पंचपात्र का जल उद्दरणी से स्वामी को दिखाकर दूसरे पात्र में छोड़ दें और स्वामी के मुख धोकर जल पीने का भाव करें)
मधुपर्कम् –
अर्जुनध्वजसंवास दशाननमदापह ।
मधुपर्कं प्रदास्यामि हनुमन् प्रतिगृह्यताम् ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः मुखे आचमनीयं समर्पयामि ।
(स्वामी को मधुपर्क अर्पित करने का भाव करते हुए, थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
स्नानम् –
गङ्गादिसर्वतीर्थेभ्यः समानीतैर्नवोदकैः ।
भवन्तं स्नपयिष्यामि कपिनायक गृह्यताम् ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि ।
(पुष्प से स्वामी पर देवता की पंचपात्र का थोड़ा जल छिड़क कर, उस पुष्प को स्वामी के चरणों में रख दें और स्वामी को स्नान कराने का भाव करें)
स्नानानन्तरं शुद्ध आचमनीयं समर्पयामि ।
(देवता की पंचपात्र का जल उद्दरणी से स्वामी को दिखाकर दूसरे पात्र में छोड़ दें और स्वामी के मुख धोकर जल पीने का भाव करें)
वस्त्रम् –
पीताम्बरमिदं तुभ्यं तप्तहाटकसन्निभम् ।
दास्यामि वानरश्रेष्ठ सङ्गृहाण नमोऽस्तु ते ॥
उत्तरीयं तु दास्यामि संसारोत्तारकारण ।
गृहाण च मया प्रीत्या दत्तं धत्स्व यथाविधि ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः वस्त्रयुग्मं समर्पयामि ।
(स्वामी को वस्त्र अर्पित करने का भाव करते हुए, थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
यज्ञोपवीतम् –
नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम् ।
उपवीतं चोत्तरीयं गृहाण रामकिङ्कर ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।
(स्वामी को यज्ञोपवीत अर्पित करने का भाव करते हुए, थोड़े अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
गन्धम् –
कस्तूरीकुङ्कुमामिश्रं कर्पूरागरुवासितम् ।
श्रीचन्दनं तु दास्यामि गृह्यतां हनुमत्प्रभो ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः दिव्य श्री चन्दनं समर्पयामि ।
(गंध को जल से भिगो कर, एक पुष्प से स्वामी पर छिड़क कर, उस पुष्प को स्वामी के चरणों में रख दें)
आभरणम् –
भूषणानि महार्हाणि किरीटप्रमुखान्यहम् ।
तुभ्यं दास्यामि सर्वेश गृहाण कपिनायक ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः सर्वाभरणानि समर्पयामि ।
(स्वामी को आभूषण अर्पित करने का भाव करते हुए, थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी को अर्पित करें)
पुष्पाणि –
सुगन्धीनि सुरूपाणि वन्यानि विविधानि च ।
चम्पकादीनि पुष्पाणि कमलान्युत्पलानि च ॥
तुलसीदल बिल्वानि मनसा कल्पितानि च ।
गृहाण हनुमद्देव प्रणतोऽस्मि पदाम्बुजे ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः नानाविध परिमल पत्र पुष्पाणि समर्पयामि ।
(थोड़े पुष्प स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
धूपम् –
दिव्यं सगुग्गुलं रम्यं दशाङ्गेन समन्वितम् ।
गृहाण मारुते धूपं सुप्रियं घ्राणतत्परम् ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः धूपं समर्पयामि ।
(घंटानाद करते हुए स्वामी को जलाई हुई अगरबत्ती दिखाएं)
दीपम् –
साज्यं त्रिवर्ति सम्युक्तं वह्निना योजितं मया ।
गृहाण मङ्गलं दीपं त्रैलोक्य तिमिरापहम् ॥
सुप्रकाशो महादीपः सर्वतस्तिमिरापहः ।
सबाह्याभ्यन्तरं ज्योतिर्दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः दीपं समर्पयामि ।
(घंटानाद करते हुए स्वामी को जलाया हुआ दीपक दिखाएं)
धूप दीपानंतरं आचमनीयं समर्पयामि ।
(देवता की पंचपात्र का जल उद्दरणी से स्वामी को दिखाकर दूसरे पात्र में छोड़ दें और स्वामी के मुख धोकर जल पीने का भाव करें)
नैवेद्यम् –
मणिपात्र सहस्राढ्यं दिव्यान्नं घृतपायसं
आपूपलड्डूकोपेतं मधुराम्रफलैर्युतम् ।
हिङ्गू जीरक सम्युक्तं षड्रसोपेतमुत्तमं
नैवेद्यमर्पयाम्यद्य गृहाणेदं कपीश्वर ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः नैवेद्यं समर्पयामि ।
(घंटानाद करते हुए, नीचे का मंत्र बोलते हुए पुष्प से जल को नैवेद्य के चारों ओर 3 बार दक्षिणावर्त दिशा में छिड़कें)
ओं भूर्भुव॑स्सुव॑: । तत्स॑वितु॒र्वरे᳚ण्य॒म् । भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धी॒महि ।
धियो॒ योन॑: प्रचो॒दया᳚त् ॥
सत्यं त्वा ऋतेन परिषिञ्चामि (पुष्प से नैवेद्य पर जल छिड़कें)
(सायङ्काले) – ऋतं त्वा सत्येन परिषिञ्चामि (पुष्प से नैवेद्य पर जल छिड़कें)
अमृतमस्तु । अमृतोपस्तरणमसि । (उस पुष्प को स्वामी के चरणों में रख दें)
ओं प्राणाय स्वाहा । (स्वामी को नैवेद्य दिखाएं)
ओं अपानाय स्वाहा । (स्वामी को नैवेद्य दिखाएं)
ओं व्यानाय स्वाहा । (स्वामी को नैवेद्य दिखाएं)
ओं उदानाय स्वाहा । (स्वामी को नैवेद्य दिखाएं)
ओं समानाय स्वाहा । (स्वामी को नैवेद्य दिखाएं)
(नीचे के मंत्र बोलते हुए पुष्प से जल को देवता के ऊपर 5 बार छिड़कें)
मध्ये मध्ये पानीयं समर्पयामि ।
अ॒मृ॒ता॒पि॒धा॒नम॑सि ।
उत्तरापोशनं समर्पयामि ।
हस्तौ प्रक्षालयामि ।
पादौ प्रक्षालयामि ।
शुद्धाचमनीयं समर्पयामि ।
ताम्बूलम् –
नागवल्लीदलोपेतं क्रमुकैर्मधुरैर्युतम् ।
ताम्बूलमर्पयाम्यद्य कर्पूरादि सुवासितम् ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः ताम्बूलं समर्पयामि ।
(स्वामी को ताम्बूल अर्पित करने का भाव करते हुए, थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
नीराजनम् –
आरार्तिकं तमोहारि शतसूर्य समप्रभम् ।
अर्पयामि तव प्रीत्यै अन्धकार निषूदनम् ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः कर्पूर नीराजनं समर्पयामि ।
(घंटानाद करते हुए स्वामी को कपूर की आरती दें)
नीराजनानन्तरं शुद्धाचमनीयं समर्पयामि । नमस्करोमि ।
(देवता की पंचपात्र का जल उद्दरणी से स्वामी को दिखाकर दूसरे पात्र में छोड़ दें और स्वामी के मुख धोकर जल पीने का भाव करें)
मन्त्रपुष्पम् –
ओं आञ्जनेयाय विद्महे वायुपुत्राय
धीमहि तन्नो हनुमत् प्रचोदयात् ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः सुवर्ण दिव्य मन्त्रपुष्पं समर्पयामि ।
(थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
आत्मप्रदक्षिण –
यानिकानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च
तानि तानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे ।
पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसम्भव ।
त्राहि मां कृपया देव शरणागतवत्सला ।
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।
तस्मात्कारुण्य भावेन रक्ष रक्ष जनार्दना ।
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः आत्मप्रदक्षिण नमस्कारान् समर्पयामि ।
(अक्षत और पुष्प लेकर, आत्म प्रदक्षिणा तीन बार करें और फिर उन्हें स्वामी के चरणों में रख दें)
साष्टाङ्ग नमस्कारम् –
उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा ।
पद्भ्यां कराभ्यां कर्णाभ्यां प्रणामोष्टाङ्गमुच्यते ॥
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः साष्टाङ्ग नमस्कारान् समर्पयामि ।
(पुरुष साष्टाङ्गं, महिला पञ्चाङ्गं नमस्कारं कुर्युः)
सर्वोपचाराः –
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः छत्रं आच्छादयामि ।
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः चामरैर्वीजयामि ।
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः नृत्यं दर्शयामि ।
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः गीतं श्रावयामि ।
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः आन्दोलिकान्नारोहयामि ।
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः अश्वानारोहयामि ।
ओं श्री आञ्जनेयाय नमः गजानारोहयामि ।
समस्त राजोपचारान् देवोपचारान् समर्पयामि ।
क्षमाप्रार्थना –
अपराध सहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया ।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर ।
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
पूजाविधिं न जानामि क्षमस्व परमेश्वर ।
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन ।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु ते ।
(पुष्पाक्षत, एक बूंद जल दाहिने हाथ में लेकर ऊपर का श्लोक पढ़कर, स्वामी के चरणों में रख दें)
अनया ध्यान आवाहनादि षोडशोपचार पूजया भगवान् सर्वात्मकः श्री आञ्जनेय सुप्रीता सुप्रसन्ना वरदा भवन्तु ॥
(थोड़े पुष्प और अक्षत स्वामी के चरणों में अर्पित कर प्रणाम करें)
तीर्थप्रसाद स्वीकरण –
अकालमृत्यहरणं सर्वव्याधिनिवारणम् ॥
समस्तपापक्षयकरं श्री आञ्जनेय पादोदकं पावनं शुभम् ॥
श्री आञ्जनेयाय नमः प्रसादं शीरसा गृह्णामि ।
(दाहिने हाथ में जल लेकर, ऊपर का श्लोक पढ़कर तीन बार तीर्थ पीएं)
ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।