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लघु विघ्नेश्वर पूजा
विधि:
सबसे
पहले
पूर्वाङ्गम्
करें
।
उसके
पश्चात,
नीचे
दिए
गए
विस्तृत
पूजा
विधान
का
पालन
करें
।
ध्यानं
–
शुक्लांबरधरं
विष्णुं
शशिवर्णं
चतुर्भुजम्
।
प्रसन्न
वदनं
ध्यायेत्सर्व
विघ्नोपशांतये
॥
अगजानन
पद्मार्कं
गजाननमहर्निशं
अनेकदंतं
भक्तानां
एकदंतमुपास्महे
॥
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
ध्यायामि
ध्यानं
समर्पयामि
।
1
॥
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
आवाहनं
–
ओं
ग॒णाना”o
त्वा
ग॒णप॑तिग्ं
हवामहे
क॒विं
क॑वी॒नामु॑प॒मश्र॑वस्तमम्
।
ज्ये॒ष्ठ॒राज॒o
ब्रह्म॑णां
ब्रह्मणस्पत॒
आ
न॑:
शृ॒ण्वन्नू॒तिभि॑स्सीद॒
साद॑नम्
॥
अस्मिन्
हरिद्राबिंबे
श्री
विघ्नेश्वरं
आवाहयामि,
स्थापयामि,
पूजयामि
।
2
॥
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
सिंहासनं
–
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
नवरत्नखचित
दिव्य
हेम
सिंहासनं
समर्पयामि
।
3
॥
(स्वामी
को
सिंहासन
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
पाद्यं
–
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
पादयोः
पाद्यं
समर्पयामि
।
4
॥
(स्वामी
के
चरण
धोने
का
भाव
करते
हुए,
देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें)
अर्घ्यं
–
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
हस्तयोः
अर्घ्यं
समर्पयामि
।
5
॥
(स्वामी
के
हाथ
धोने
का
भाव
करते
हुए,
देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें)
आचमनीयं
–
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
मुखे
आचमनीयं
समर्पयामि
।
6
॥
(देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें
और
स्वामी
के
मुख
धोकर
जल
पीने
का
भाव
करें)
स्नानं
–
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
शुद्धोदक
स्नानं
समर्पयामि
।
7
॥
(पुष्प
से
स्वामी
पर
देवता
की
पंचपात्र
का
थोड़ा
जल
छिड़क
कर,
उस
पुष्प
को
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें
और
स्वामी
को
स्नान
कराने
का
भाव
करें)
स्नानानंतरं
आचमनीयं
समर्पयामि
।
(देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें
और
स्वामी
के
मुख
धोकर
जल
पीने
का
भाव
करें)
वस्त्रं
–
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
वस्त्रं
समर्पयामि
।
8
॥
(स्वामी
को
वस्त्र
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
यज्ञोपवीत
–
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
यज्ञोपवीतार्थं
अक्षतान्
समर्पयामि
।
(स्वामी
को
यज्ञोपवीत
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
आभरणं
–
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
आभरणं
समर्पयामि
।
9
॥
(स्वामी
को
आभूषण
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
को
अर्पित
करें)
गंधं
–
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
दिव्य
श्री
गंधं
समर्पयामि
।
10
॥
(गंध
को
जल
से
भिगो
कर,
एक
पुष्प
से
स्वामी
पर
छिड़क
कर,
उस
पुष्प
को
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
पुष्पैः
पूजयामि
–
ओं
सुमुखाय
नमः
।
ओं
एकदंताय
नमः
।
ओं
कपिलायनमः
।
ओं
गजकर्णकाय
नमः
।
ओं
लंबोदरायनमः
।
ओं
विकटाय
नमः
।
ओं
विघ्नराजाय
नमः
।
ओं
गणाधिपायनमः
।
ओं
धूमकेतवे
नमः
।
ओं
गणाध्यक्षाय
नमः
।
ओं
फालचंद्राय
नमः
।
ओं
गजाननाय
नमः
।
ओं
वक्रतुंडाय
नमः
।
ओं
शूर्पकर्णाय
नमः
।
ओं
हेरंबाय
नमः
।
ओं
स्कंदपूर्वजाय
नमः
।
ओं
सर्वसिद्धिप्रदाय
नमः
।
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
नानाविध
परिमळ
पत्र
पुष्पाणि
समर्पयामि
।
11
॥
(प्रत्येक
नाम
के
लिए
एक-एक
पुष्प
स्वामी
को
अर्पित
करें)
धूपं
–
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
धूपं
आघ्रापयामि
।
12
॥
(घंटानाद
करते
हुए
स्वामी
को
जलाई
हुई
अगरबत्ती
दिखाएं)
दीपं
–
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
प्रत्यक्ष
दीपं
समर्पयामि
।
13
॥
(घंटानाद
करते
हुए
स्वामी
को
जलाया
हुआ
दीपक
दिखाएं)
धूप
दीपानंतरं
आचमनीयं
समर्पयामि
।
(देवता
की
पंचपात्र
का
जल
उद्दरणी
से
स्वामी
को
दिखाकर
दूसरे
पात्र
में
छोड़
दें
और
स्वामी
के
मुख
धोकर
जल
पीने
का
भाव
करें)
नैवेद्यं
–
(घंटानाद
करते
हुए,
नीचे
का
मंत्र
बोलते
हुए
पुष्प
से
जल
को
नैवेद्य
के
चारों
ओर
3
बार
दक्षिणावर्त
दिशा
में
छिड़कें)
ओं
भूर्भुव॒स्सुव॑:
।
तत्स॑वि॒तुर्वरे”ण्य॒o
भर्गो॑
दे॒वस्य॑
धीमहि
।
धियो॒
यो
न॑:
प्रचो॒दया”त्
॥
प्रातः
काले
–
स॒त्यं
त्व॒र्तेन॒
परि॑षिंचामि
(पुष्प
से
नैवेद्य
पर
जल
छिड़कें)
सायंकाले
–
ऋ॒तं
त्वा॑
स॒त्येन॒
परि॑षिंचामि
(पुष्प
से
नैवेद्य
पर
जल
छिड़कें)
अमृतमस्तु
।
अ॒मृ॒तो॒प॒स्तर॑णमसि
।
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
………………
समर्पयामि
।
(उस
पुष्प
को
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
ओं
प्रा॒णाय॒
स्वाहा”
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
अ॒पा॒नाय॒
स्वाहा”
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
व्या॒नाय॒
स्वाहा”
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
उ॒दा॒नाय॒
स्वाहा”
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
ओं
स॒मा॒नाय॒
स्वाहा”
।
(स्वामी
को
नैवेद्य
दिखाएं)
(नीचे
के
मंत्र
बोलते
हुए
पुष्प
से
जल
को
देवता
के
ऊपर
5
बार
छिड़कें)
मध्ये
मध्ये
पानीयं
समर्पयामि
।
अ॒मृ॒ता॒पि॒धा॒नम॑सि
।
उत्तरापोशनं
समर्पयामि
।
हस्तौ
प्रक्षाळयामि
।
पादौ
प्रक्षाळयामि
।
शुद्धाचमनीयं
समर्पयामि
।
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
नैवेद्यं
समर्पयामि
।
14
॥
तांबूलं
–
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
तांबूलं
समर्पयामि
।
15
॥
(स्वामी
को
ताम्बूल
अर्पित
करने
का
भाव
करते
हुए,
थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
नीराजनं
–
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
नीराजनं
समर्पयामि
।
16
॥
(घंटानाद
करते
हुए
स्वामी
को
कपूर
की
आरती
दें)
मंत्रपुष्पं
–
सुमुखश्चैकदंतश्च
कपिलो
गजकर्णकः
लंबोदरश्च
विकटो
विघ्नराजो
गणाधिपः
॥
धूमकेतुर्गणाध्यक्षः
फालचंद्रो
गजाननः
वक्रतुंडश्शूर्पकर्णो
हेरंबस्स्कंदपूर्वजः
॥
षोडशैतानि
नामानि
यः
पठेच्छृणुयादपि
विद्यारंभे
विवाहे
च
प्रवेशे
निर्गमे
तथा
संग्रामे
सर्वकार्येषु
विघ्नस्तस्य
न
जायते
॥
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
सुवर्ण
मंत्रपुष्पं
समर्पयामि
।
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
प्रदक्षिणं
–
यानिकानि
च
पापानि
जन्मांतरकृतानि
च
।
तानि
तानि
प्रणश्यंति
प्रदक्षिण
पदे
पदे
॥
पापोऽहं
पापकर्माऽहं
पापात्मा
पापसंभवः
।
त्राहि
मां
कृपया
देव
शरणागतवत्सल
॥
अन्यधा
शरणं
नास्ति
त्वमेव
शरणं
मम
।
तस्मात्कारुण्य
भावेन
रक्ष
रक्ष
गणाधिप
॥
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
प्रदक्षिणा
नमस्कारान्
समर्पयामि
।
(अक्षत
और
पुष्प
लेकर,
आत्म
प्रदक्षिणा
तीन
बार
करें
और
फिर
उन्हें
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
छत्र
चामरादि
समस्त
राजोपचारान्
समर्पयामि
॥
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर
प्रणाम
करें)
क्षमाप्रार्थन
–
यस्य
स्मृत्या
च
नामोक्त्या
तपः
पूजा
क्रियादिषु
।
न्यूनं
संपूर्णतां
याति
सद्यो
वंदे
गजाननं
॥
मंत्रहीनं
क्रियाहीनं
भक्तिहीनं
गणाधिप
।
यत्पूजितं
मयादेव
परिपूर्णं
तदस्तु
ते
॥
ओं
वक्रतुंड
महाकाय
सूर्य
कोटि
समप्रभ
।
निर्विघ्नं
कुरु
मे
देव
सर्व
कार्येषु
सर्वदा
॥
(पुष्पाक्षत,
एक
बूंद
जल
दाहिने
हाथ
में
लेकर
ऊपर
का
श्लोक
पढ़कर,
स्वामी
के
चरणों
में
रख
दें)
अनया
ध्यान
आवाहनादि
षोडशोपचार
पूजया
भगवान्
सर्वात्मकः
श्री
विघ्नेश्वर
सुप्रीतो
सुप्रसन्नो
वरदो
भवंतु
॥
उत्तरे
शुभकर्मण्यविघ्नमस्तु
इति
भवंतो
ब्रुवंतु
।
उत्तरे
शुभकर्मणि
अविघ्नमस्तु
॥
तीर्थं
–
अकालमृत्युहरणं
सर्वव्याधिनिवारणं
।
समस्तपापक्षयकरं
श्री
विघ्नेश्वर
पादोदकं
पावनं
शुभं
॥
श्री
विघ्नेश्वर
प्रसादं
शिरसा
गृह्णामि
॥
(दाहिने
हाथ
में
जल
लेकर,
ऊपर
का
श्लोक
पढ़कर
तीन
बार
तीर्थ
पीएं)
उद्वासनं
–
(गणपति
विग्रह
को
या,
फोटो
को
उद्वासन
की
आवश्यकता
नहीं
है
।
केवल
हल्दी
से
बने
गणपति
को
ही
उद्वासन
कहना
चाहिए)
ओं
य॒ज्ञेन॑
य॒ज्ञम॑यजन्त
दे॒वाः
।
तानि॒
धर्मा॑णि
प्रथ॒मान्या॑सन्
।
ते
ह॒
नाक॑o
महि॒मान॑स्सचन्ते
।
यत्र॒
पूर्वे॑
सा॒ध्यास्सन्ति॑
दे॒वाः
॥
ओं
श्री
विघ्नेश्वराय
नमः
यथास्थानं
उद्वासयामि
॥
शोभनार्थे
क्षेमाय
पुनरागमनाय
च
।
(थोड़े
पुष्प
और
अक्षत
स्वामी
के
चरणों
में
अर्पित
कर,
हल्दी
के
गणपति
को
आगे,
पीछे
हिलाकर
प्रणाम
करें)
ओं
शांतिः
शांतिः
शांतिः
।
Recite with devotion and pure heart
Regular practice brings spiritual benefits